Gandhi ka Satyagraha aur Hindu Vichar
अहिंसा की अमोघ शक्ति और सत्य की अंतिम विजय पर गाँधी का चिरस्थायी विश्वास था। इसी विश्वास के आधार पर उन्होंनें सत्याग्रह को सुनियोजित गति दी जो आजतक सुसंगत है। उदाहरण के लिए सत्ता के विरोध में पोलैंड की एकता की विजय, यद्यपि मर्यादित है, सत्याग्रह आंदोलन के कारण अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई। इस प्रकार से यद्यपि गाँधी के सत्याग्रह का प्रभाव सर्वमान्य है, लेकिन सत्याग्रहियों से सख्त या अनिवार्य अपेक्षाओं की कम ही तारीफ़ हुई। जो घटनाएँ हुई उससे ऐसा प्रतीत हुआ कि सत्याग्रहियों से आध्यात्मिक वचनबद्धता के अलावा और अन्य कुछ अपेक्षित नहीं था।
सत्याग्रह अर्थात् ‘सत्य के लिए किया हुआ हठ’, की व्युत्पत्ति वैदिक शब्द ‘सत्यबद्धता’ से हुई है, जिसका प्रयोग गाँधी ने स्थिर राजनीतिक विचार और प्रक्रिया के लिए किया हुआ अंशत: योगदान था। ‘सत्य’ शब्द का प्रयोग उन्होंने ‘ईश्वर’ के स्थान पर किया। उन्होंने प्रबलता से कहा कि ‘सत्य’ का प्रयोग सिर्फ सत्याग्रह के लिए न होकर जीवनभर उसी विचार के अनुसार व्यवहार भी करना चाहिए। इसके लिए उन्होंने भारतीय परंपरा के ‘व्रत’ या शपथ इस शब्द का उपयोग किया है, जिसके अनुसार ‘वेदान्त’ के वेदों में ‘ऋत’ का महत्त्व ‘सत्-ब्राह्मण’ से है; भगवत गीता में ‘अनासक्ति’ से है; और बुद्ध की ‘अहिंसा’ से है।
गाँधी के कार्य और विचारानुसार, धर्म और राजनीति अविभाज्य हैं। ‘हिन्द स्वराज्य’ में एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंनें लिखा था,
आपके तर्क से ऐसा लगता है कि राजनीति और धर्म या आध्यात्म का संबंध-विच्छेद होना चाहिए। आधुनिक काल में इसी का अनुभव हमें दैनिक जीवन में होता है। निष्क्रिय विरोध किसी भी वर्ग के राजनीतिक और धर्म के नैतिक सिद्धांतों का स्वाभाविक रूप से परीक्षण करता है।1
अत: गाँधी के सत्याग्रह को समझने के लिए उनका हिंदुत्व से लगाव समझना आवश्यक है क्योंकि वे स्वयं को ‘हिंदू’ मानते थे, लेकिन हिंदुत्व में सिखायी जा रही हर बात से वे सहमत नहीं थे। गाँधी कहते थे, ‘वे हिंदू हैं क्योंकि हिंदुत्व की वजह से उन्हें वह सबकुछ मिला, जिसकी उन्हें जरूरत है और हिंदुत्व उनकी निरंतर ‘सत्य की खोज’ के उन सारे पहलुओं की सार्थकता बताता है।उन्होंने लिखा:
हिंदुत्व वैशिष्ट्यपूर्ण धर्म नहीं है। संसार के सभी प्रेषितों को उसके ह्रदय में स्थान है। सामान्य विचारधारा की तरह यह कोई जीवनलक्ष्यित धर्म नहीं है। अपने आगोश में इसने कई जनजातियों को समा लिया है, लेकिन यह विलिनीकरण सूक्ष्म विकासशीलता की विशिष्टता से प्रभावित रहा। हिंदुत्व ने सबको अपनी आस्था और इच्छा के अनुसार श्रद्धा प्रकट करने की सुविधा दे रखी है; अत: यह सभी धर्मों के साथ शांति से रहता है।2
आभार: मैं, पुणे विश्वविद्यालय के डॉ. राम बापट की और बड़ौदा के एम.एस. विश्वविद्यालय के थॉमस पंथम की टिप्पणियों और सुझाव की आभारी हूँ।
उनकी अपूर्ण व्याख्याओं के माध्यम से उनके राजनीतिक विचार धार्मिक श्रद्धा से परिपूर्ण हैं जो स्पष्टत: एकता के प्रतीक जान पडते हैं। भारतीय परंपराओं की अखंडित मान्यताओं पर वे उनके सिद्धांत प्रकट करते हैं और ‘पुराने सत्यवचनों पर नया प्रकाश डालना चाहते हैं’। अत: उनका विश्वास है कि परंपरानुसार ही वे कार्य, विचार और वचन प्रस्तुत करते हैं।
गाँधी का हिंदू परंपरा के बारे में अंतर्ज्ञानी विचार है। वे लोकरीति के विचार प्रवाह से अत्यधिक प्रभावित हैं जिन्होंने भारतीय धर्म का सार सुरक्षित रखा है। उनके विचार स्पष्ट रूप से इन महत्त्वपूर्ण मुद्दों को पुनःप्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं: ‘हिंदू धर्म बहुमूल्य रत्नों से भरे अमर्याद रत्नाकर की तरह है। आप जितनी गहराई में डुबकी लगाएँगे उतना ही अधिक खज़ाना आपको मिलेगा।’3 लेकिन हिंदू परंपरा के पुनर्निर्माण में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी इसलिए उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टि का सैद्धांतिक वृत्तांत प्रस्तुत नहीं किया। इसी वजह से उनके विचारों की सुसंगति और उसका हिंदू धर्म के साथ मौलिक विचार हमेशा से अनदेखा रहा। यहाँ हमने हिंदू परंपरा के बारे में गाँधी के विचार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।
अंतर्ज्ञान से गाँधी ने वेदों का “अस्तित्वपरक” अन्तरंग ग्रहण किया था और साथ ही हिंदू विचारों की उपलब्धि भी हासिल की थी। उन्होंने उन विचारों को सुन्न हुए सामाजिक रिवाजों से अलग सुधारित समकालीन हिंदुत्व के लिए तैयार किया। हम कह सकते हैं कि वे ऐसा कर सके क्योंकि हिंदू परंपराओं की अंतर्दृष्टि उन्हें अन्य व्याख्याओं से नहीं बल्कि जीवित जन परंपराओं से हुई। यही उनका प्रेरणा स्रोत था और साथ ही सामान्य लोगों के साथ घनिष्ट संपर्क रखने का आधार था, जिससे वे संवैधानिक सुधार आंदोलन को स्वतंत्रता के सामूहिक संघर्ष में परिवर्तित कर सके।
“अहिंसा के मार्ग से सत्य की खोज” इन शब्दों में गाँधी ने हिंदुत्व की परिभाषा की।4 अत: सत्य के पूर्ण अर्थ की चर्चा करना आवश्यक है। सामान्य भारतीय शब्द ‘सत्य’ का मूल स्रोत वैदिक भाष्य में पाया जाता है। वैदिक भाष्य की केन्द्रीय संकल्पना ‘ऋत्’ का आधुनिक संशोधित अर्थ “सत्य’ माना गया है। दीर्घकाल से ‘ऋत्’ की व्याख्या अलग-अलग विद्वानों के द्वारा विभिन्न अर्थों में मान्य हुई है। इनमें से कई व्याख्याएँ वेदकाल की हिंदू दार्शनिकता का प्रधान तत्व प्रस्तुत करती हैं। उन्होंने ‘ऋत्’ का अनुवाद ‘नियम’ या ‘ब्रम्हांडीय नियम’ इस स्वरूप में किया।कुछ साल पहले लुडर्स ने ‘ऋत्’ का अर्थ ‘सत्य’ बताया है और जब वेदों के सभी अवतरणों में बार-बार इसका उल्लेख होता है तब यही अर्थ योग्य आशय प्रस्तुत करता है।5 सत्य की संकल्पना यह प्रमाण माँगता है जिससे इसे योग्यता प्राप्त हुई है। अत: हम ‘ऋत्’ का अर्थ ‘दृढ़ सत्य’ मान सकते हैं। अत: हम मान सकते हैं, ‘दृढ़’ का मतलब अस्तित्वपरक बाध्यता, जो मानव, ईश्वर और इहलोक को स्पष्टत: बंधित रखती है। यही बंधन वेदों के कई अवतरणों की वैशिष्टता को आव्हान करती है जिसमें ‘ऋत्’ का उल्लेख है।
सत्य के दृढ़ बंधन के गुण को जानने के लिए ‘ऋत्’ के अभिभावक, ‘मित्र’ और ‘वरुण’ का परिचय होना आवश्यक है। द्युमझिल ने बताया है कि मित्र और वरुण, अलग-अलग कार्य करनेवाली जोड़ी है।6 मित्र ‘समझौते’ का ईश्वर है, और वरुण ‘शपथ’ का ईश्वर है। मित्र को सकारात्मक और रक्षक का कार्य है, वरुण को दंडात्मक और संयमन का कार्य है। इस तरह से अगर मित्र सत्य का साथ देता है तो वरुण दृढ़ता का। मित्र ब्राह्मण विचारधारा, ‘सत्’ और ‘सत्य’ में विलीन हो जाता है जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे। लेकिन जो सत्य के पथ से भ्रष्ट हो जाते हैं उनको दृढ़ता से पुन:वापस लाने का अस्तित्वपरक कार्य वरुण को करना पड़ता है। ‘ऋत्’ की दृढ़ता, जिसे वरुण लागू करता है, का परिणाम, स्वयंप्रेरित होता है; लेकिन जब उसे आवाहन दिया जाता है तब, जो व्यक्ति उसे आवाहन देता है, उसे गंभीर जिम्मेदारी का सामना करना पड़ता है।
शपथ के बारे में यह बात स्पष्ट रूप से बताई गयी है, क्योंकि प्रत्येक शपथ जब एक बार ग्रहण की जाती है, और वह अगर पूर्ण नहीं की जाती है, तो आवाहन करनेवाले व्यक्ति को शाप का सामना करना पड़ता है। वरुण इन घटनाओं का सिर्फ प्रत्यक्षदर्शी होता है, जो अपने प्रिय तत्व ‘जल’ के माध्यम से प्रतिनिधित्व करता है; और जब शपथ तोड़ दी जाती है तब वह शाप का प्रबंध करता है – इस तरह से वह मानव को ‘बंधित’ रखता है। शपथ और आव्हान उस व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है जो आह्वान करता है: वह प्रारंभ करता है, जिसके फलस्वरूप ईश्वर, मानव और यह विश्व एकात्म होते हैं; और यहीं, सामर्थ्य और उससे उत्पन्न संकट होता है। अत: आव्हान अस्तित्वपरक सार्थकता व्यक्त करता है। संकटों से भागना नहीं चाहिए बल्कि उनका सामना करना चाहिए। सुरमयी संगीत और प्रशंसारूपी सच्चा आव्हान, ईश्वरी सामर्थ्य में वृद्धि करते हैं, और इसलिए ऋत्वृद्ध (जो ऋत् की दृढ़ता को बढाता है) जाने जाते हैं। आव्हान करते समय मानव ईश्वर के साथ का अपना बंध (धार्मिक) दृढ़ करता है।
गाँधी ऋत् के अर्थ को अपने ‘सत्य के साथ प्रयोग’ में नया रूप देते हैं। उनकी व्याख्या के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ये प्रयोग अपने नैमित्तिक व्यावहारिक रूप से मुक्ति पाते हैं और उनका सच्चा स्वरूप प्रकट करते हुए बंधन की पुनरावृत्ति के गंभीर संकट को मोल लेते हैं। असत्य कार्य के बंधनों के परिणामों की समस्या, गाँधी के विचारों में बहुत विशाल रूप में दिखाई देती है, और हम बाद में भगवतगीता के विचारों के साथ उनकी इस व्याख्या की चर्चा करेंगे।
उपनिषदों में, सत् या सत्त्व, सुप्त अस्तित्व ही पार-वैशिष्टता या ब्रह्मस्वरूप है। तत् त्वम् असि (तुम ही वह हो) यह प्रसिद्ध सिद्धांत छान्दोग्योपनिषद् में तादात्म्य स्थापित करता है। इसी तत्वज्ञान को गाँधी संक्षेप में ‘सत्य ही ईश्वर है’ कहते हैं। उनका ईश्वर, मानव और सारी जीवसृष्टि के तादात्म्य पर विश्वास है। यह विचार उपनिषद के सत्य-ब्रम्हन इस व्यष्टिविज्ञान के समीकरण के समांतर है।7 व्यष्टिविज्ञान में ‘सत्य’ यह एकमात्र सूत्र नहीं है। वेदांत दार्शनिकों से कहीं अधिक बढ़कर यह यह तत्वज्ञान है। इसने अपना जादुई लक्ष्यार्थ सुरक्षित रखा जो इसे निष्क्रिय ‘ऋत्’ से धरोहर में मिला था। सत्य की जादुई परंपरा को विभिन्न धार्मिक सांप्रदायिक विचारों ने, जैसे बौद्ध, जैन और तंत्र विद्या ने भी बनाए रखा।
सत्य की आव्हानात्मक क्रियाओं से हम ‘धर्म’ के सूत्र का विचार करने लगते हैं, जिसका विचार भारत में कई सदियों से होने की वजह से महत्त्वपूर्ण है। धर्म की व्युत्पत्ति ‘धर’ इस शब्द से हुई है—जिसका अर्थ है ‘धारण करनेवाला, अडिग, समर्थ, थामना (सँभालना)। वैदिक काल में धर्म का अर्थ होता था “बलिदान करने से लाभार्थ शुद्धता”।8 मॅानिअर विल्यम्स ने तर्क प्रस्तुत किया कि ऋग्वेद के पुराने रूप में धर्मन प्रस्तुत किया गया है, अर्थात् “वह जो दृढ़तापूर्वक स्थापित है; अटल; आदेश.....कानून, अध्यादेश, नैतिकता, ईमानदारी, धर्म।9” इस तरह से यह शब्द न केवल धार्मिकता या कर्तव्य की ओर संकेत करता है बल्कि उस वैश्विक आदेश की ओर इशारा करता है जिससे संपूर्ण ब्रम्हांड नियंत्रित होता है और कायम रहता है।10 ऋत् शब्द से धर्म ने दायित्व को स्वीकार किया, और सत्य ने निष्ठा को स्वीकार किया। अर्थात् ऋत् में ही सत्य-धर्म निहित है।वैदिक तत्व के अनुसार ऋत् में समष्टि और नैतिकता दोनों ही समाए हैं। तात्विक विचार के विकास के पश्चात इन दोनों ही विचारों को विशेष श्रेणी मिली। लेकिन दोनों के सामान्य मूल पर भारतीय तत्वज्ञान का प्रभाव रहा।
अब धर्म का चित्रण हम समष्टिवादी नैतिकता के स्वरूप में कर सकते हैं। डॉ. राधाकृष्णन ने इसका स्पष्टीकरण देते हुए कहा: “धर्म जीवन की विभिन्न क्रियाओं को दिशा और सुसंगति देता है। इसमें जीवन के सम्पूर्ण नियम हैं, मानव जीवन का सामंजस्य जिसे योग्य और न्याय संगत जीवन जीने की इच्छा होती है। प्रत्येक व्यक्ति और समाज को, आत्मा, बुद्धि,जीवन और शरीर का स्व-धर्म होता है।”11
धर्म और स्व-धर्म में जीवन का बोध यज्ञ (चढावा) द्वारा ईश्वर को प्रस्तुत किया हुआ, यह अव्यक्त विचार निहित है। यह जीवन विषयक संस्कारी विचार समष्टिवाद की विशिष्टता है। समष्टिवाद की यह विशिष्टता जब धर्म का प्रयोग समाज या मानवता के लिए किया जाता है तब स्पष्ट हो जाती है। धर्म पार-व्यष्टिवादी होने की वजह से सामाजिक अनुबंध की कोई आवश्यकता नहीं होती; जब सब लोग स्व-धर्म के अनुसार कार्य करते हैं तब अपनेआप समरसता उत्पन्न होती है। अगर समग्र धर्म का विघटन हुआ तो सामाजिक नैतिकता के साथ स्व-धर्म का संघर्ष नहीं होगा। परिणामस्वरूप धर्म, सत्य के अनुरूप होने पर वह अत्यंत प्रभावशाली होगा। अत: भारत में “सत्ययुग” को स्वर्णिम युग समझा गया है, “सब लोग स्व-प्रबुद्धता और ईश-अस्तित्व के विचारानुसार स्वतंत्रता से रहते थे; इसलिए वे आतंरिक दैवी धर्म के अनुसार उत्स्फूर्त प्रतिक्रिया देते थे।”12
इसी प्रकार से गाँधी भी अपने आत्मचरित्र में प्रतिपादित करते हैं कि धर्म और राजनीति (राजकारण) का विचार स्वतंत्र रूप से नहीं हो सकता है।13 उन्होंने कहा, “आध्यात्मिक नियम अपनेआप कार्य करते हैं इस बात पर मेरा विश्वास नहीं है। बल्कि इसके विपरित जीवन के सामान्य कार्यों के द्वारा यह व्यक्त होता है। इस प्रकार से वह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों को प्रभावित करता है।”14 इसके अतिरिक्त:
वैश्विक और सर्वसमावेशक सत्य का तेजस्वी सामना करने के लिए सब को अंतर्निहित सबसे बुरे सृजन से स्नेह करना आना चाहिए। और जो व्यक्ति यह आकांक्षा पूर्ण करता है, वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रह सकता। यही वजह है कि राजनीति के क्षेत्र में सत्य की निष्ठा ने मुझे आकर्षित किया है; और बिना किसी झिझक के और पूरी नम्रता से मैं कह सकता हूँ कि जो यह निवेदन करते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें धर्म का अर्थ समझ में नहीं आया।15
इस प्रकार हमने देखा कि कैसे हिंदू दार्शनिक तत्वज्ञान के अनुसार धर्म, सत्य और ऋत् एकदूसरे से जुड़े हुए हैं। हमने यह भी जाना कि गाँधी, भारतीय विचार के वैदिक मूलाधार का पता लगाते हैं और यह प्रतिपादित करते हैं कि सत्य ही हिंदुओं का धर्म है और सत्य ही ईश्वर है। इस तरह से उन्होंने दृढ़ सत्य के दैविक गुणों का पुनर्ग्रहण अपने सत्याग्रह में किया, जो प्रत्येक व्यक्ति को सत्य से बांधकर रखता है। अब इसके आगे हमें योग्य क्रियात्मकता की समस्या का विचार करना है, ऐसी क्रियात्मकता जो नैतिक समष्टिवाद के जितनी ही सक्षम होगी।
सत्याग्रह में सम्मिलित योग्य क्रियात्मकता की समस्या, गाँधी के राजनीतिक विचारों का आधार है। अल्बर्ट श्वाइत्ज़र के कथन के अनुसार, “बुद्ध ने जिसका प्रारंभ किया उसीको भगवतगीता ने प्रवाहित रखा......जब किसी क्रिया को करने के बावजूद उसे नहीं करने का भाव होता है तब सर्वोच्च निष्क्रियता की चिकित्सा होती है....यदि ईश्वर विश्व के निर्माण और रक्षण का कार्य करते हैं, तो मानव को भी क्रियाशील रहना चाहिए”।
भगवत गीता में कहा गया है कि यह क्रियाशीलता धर्म पर आधारित होनी चाहिए, जहाँ फल की आसक्ति नहीं होनी चाहिए या पुरस्कार की भी इच्छा नहीं होनी चाहिए। “ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण” की भावना ही अनासक्ति का समर्थन है। श्वाइत्ज़र आगे कहते हैं, ‘भगवतगीता का इसी बात में आकर्षण है कि उच्च भाव की प्रेरणा से ही इसकी भावात्मक कार्यशीलता प्रकट होती है।’16
लेकिन अनासक्ति की यह भावना दार्शनिक समस्याएँ उत्पन्न करती हैं।जिसके मूल में भारतीय अद्वैत और अविद्या (अज्ञान और झूठी चेतना) की कर्म के साथ संबंध की कल्पना जुडी है। प्रारंभिक उपनिषदों में मानव और सर्वोच्च ईश्वर के बीच तादात्म्य स्थापित करने की, अद्वैतवाद की दार्शनिकता प्रस्तुत की गयी है। लेकिन इस कल्पना के स्पष्टीकरण ने प्रश्न उपस्थित किए; क्योंकि हम द्वैतवाद और विविधता को क्यों महसूस करते हैं इसे स्पष्ट करना जरूरी हो गया। यह पश्चिमी दार्शनिकता की एक और अनेक की समस्या के समान ही है। मगर पश्चिमी दार्शनिकता जहाँ अनेकता के तथ्यों की अद्वितीयता की अवधारणा में दिलचस्पी रखती है, भारतीय दार्शनिकता विभिन्नता में एकता व्यक्त होने का भाव या एक के अस्तित्व (ब्रम्हं-सत्-आत्मन्) की अवधारणा में दिलचस्पी रखती है। अविद्या (झूठी चेतना) की अवधारणा से विविधता की अनुभूति का उद्गम होता है। सारे गौण लक्षण सत्य प्रतीत होने लगते हैं। परन्तु अविद्या की वजह क्या है? क्या कारण है कि चेतना झूठी साबित होती है? कर्म, कार्य चेतना को झूठा तय करता है, जिससे मानव प्रकटीकरण और सत्यता के बीच अंतर महसूस नहीं कर सकता।
क्रोध (राग) के कारण कार्य करनेवाला (कर्मन) समझ नहीं पाता;
अत: जब उनका जगत् नि:शेष होता है, तब शोक संतप्त होकर उनकी सोच का ह्रास होता है.......
वे इस इहलोक में या निम्नलोक में पुनर्प्रवेश करते हैं।17
यहाँ सारे धर्मसूत्र संक्षेप में मौजूद हैं; कर्म और अज्ञान के बीच पारस्परिक संबंध, कर्म और भावनाओं के बीच पारस्परिक संबंध, पुनर्जन्म का धर्मसूत्र, और विविधता से संयोजित किए हुए ब्रम्हांडीय पदानुक्रम। एक बार एकात्म से अधिकता की ओर की दिशा (पश्चिमी दार्शनिकता के मुताबिक़, अनेकता से एकता की ओर के बदले) मान्य कर लेना, कि प्रकटीकरण की विविधता से विशालता की विविधता की ओर, और फिर से प्रकटीकरण (पुनर्जन्म की बहुलता, ब्रम्हांड) की ओर यह सब नियमितता के अनुसार है, तो यह योग्य तर्क है।
यह मान्य करना कि निचला और श्रेष्ठ जगत दोनों हैं और क्रियाशीलता के साथ आसक्ति होने के कारण अज्ञानता का उगम होता है, तब इस निष्कर्ष तक पहुँचते हैं कि सिर्फ अनासक्त क्रिया-अगर कोई क्रिया हो-तो वह श्रेष्ठ जगत की ओर ले चलती है जो सर्वोच्च ईश के सत्य स्वरूप की पहचान होगी।
वैदांतिक अद्वैतवादी, शंकराचार्य, गीता की अनासक्त सक्रियता का अर्थ उनकी अद्वैतवादी अनिवार्यता से जोड़ते हैं। वे इस निष्पन्न तक पहुँचते हुए बताते हैं कि ब्राह्मणों की निचली और श्रेष्ठ समानता को गीता में पूर्वमान्यता है। इस समानता की अभिकल्पना को गीता ने बल प्रदान करने के कारण कृष्ण ने अपनेआप को मानव के रूप में दीर्घ काल तक प्रस्तुत किया; लेकिन एक बार अर्जुन के अनुरोध पर अपना विस्मयकारी दैवी रूप प्रकट किया, जो मानव की असीम कल्पना से परे था। गीता में वर्णित दो स्तरों की पूर्ण श्रेष्ठता के सत्त्व में भेद समझाने में शंकराचार्य का योगदान है। आगे उन्होंने समझाया है कि जिस व्यक्ति ने ‘अविद्या’ से मुक्ति पायी है उसके लिए ‘क्रियाशीलता’ या ‘निष्क्रियता’ कुछ भी नहीं होते। अत: गीता में बताई गई विधि - व्यक्तिगत देवता सहित- सिर्फ अनुभूति है; वास्तविकता में गीता में बताए गए उच्च विचार के अनुसार त्याग को सर्वोच्च माना गया है, जिसका योग्य मार्ग संन्यासी बनकर जीवन जीने में है।
कार्य को एक बार समर्थन देने के बाद योग्य कार्यान्वयन की श्रेणी का विचार आवश्यक हो जाता है।आध्यात्मिक विचार से, कार्यान्वयन उस समय योग्य होता है, जब व्यक्ति की विचारधारा को अविद्या की अनिश्चितता से वह बंधित नहीं रखता है और कर्म के संचय से पुनर्जन्म के चक्र की शृंखला में बांधकर नहीं रखता है। अत: कार्य न केवल अनासक्त हो बल्कि यज्ञ स्वरूप हो, ईश्वर को अर्पण करने की भावना से परिपूर्ण हो।
स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्ष के समय योग्य कार्यान्वयन की दिशा निश्चितता में विवाद खड़े हुए। जब तिलक, रुढ़िवादी राष्ट्रीय नेता कारावास में थे, उन्होंने भगवतगीता पर भाष्य लिखा था। उन्होंने लिखा है, “ इस तरह के कार्यान्वयन के लिए कार्रवाई की ही आवश्यकता है।”18 मनुष्य जो कुछ भी कार्य करता है वह उसे समर्पण की भावना से करना चाहिए।उनके विचारानुसार, गीता में कहा है, “समर्पण की भावना से किया हुआ कार्य शृंखला में बांधकर नहीं रखता है।” उनके लिए कर्मयोग ही पूर्ण श्रेष्ठता का मार्ग है।
तिलक ने अगर कार्य के प्रति अनासक्ति की भावना को महत्त्व दिया तो गाँधी ने अनासक्ति के मूलाधार तक पहुंचने का प्रयास किया। उन्होंने महसूस किया कि कहीं अन्य आसक्ति की भावना है इसलिए कार्य के परिणाम से अनासक्ति कायम रखना आवश्यक है। उनका मानना है कि सत्य और अहिंसा के प्रति आसक्ति होनी चाहिए। अहिंसा पर प्रभुत्व का अर्थ है, अपआधिपत्य। यह “स्व-नियंत्रण” की ओर पहला कदम है। अब यहाँ अर्थ के दृष्टिकोण से एक नई समस्या उभरती है, क्योंकि भगवतगीता के द्वारा कृष्ण ने अर्जुन को रणांगण में युद्ध करने के लिया प्रेरित किया था। अत: गाँधी, तिलक की तरह गीता के कर्मयोग को मानते हैं, लेकिन वे तिलक की तरह भगवतगीता का सिर्फ बाह्य मूल्यांकन नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म और भगवतगीता के अध्ययन के पश्चात उसमें कहीं भी शारीरिक युद्ध उन्होंने नहीं पाया और हिंसा से ज्यादा अहिंसा के भाव पर ही केन्द्रीय तत्व निर्भर है।19
इस प्रकार गाँधी के अनुसार, अर्जुन, कृष्ण के साथ युद्ध की चर्चा नहीं करता है, जो अपने ही रिश्तेदारों को मारने के विचार से झिझकता हुआ जान पडता है। अत: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, “तुमने युद्ध में पहले ही हिंसा की है, अब अचानक अहिंसा के विचार से तुम मन में विवाद नहीं कर सकते। जिस कार्य का तुमने प्रारंभ किया है, उसे अब समाप्त करो।” इस प्रकार कृष्ण, अर्जुन को स्व-धर्म का पालन करने का उपदेश करते हैं, जो योद्धा (क्षत्रिय) का आवश्यक कर्तव्य होता है। अहिंसक कृष्ण, अर्जुन को अन्य कोई उपदेश नहीं देते हैं। “लेकिन, भगवतगीता युद्ध करने का उपदेश या उसे न्यायसंगत कहती है, यह कहना उतना ही गलत है जितना यह कहना कि हिंसा जीवन का कानून है,” ऐसा गाँधी ने कहा।20 और फिर वे भगवतगीता में निहित अर्थ को उच्च स्तर पर ले जाकर स्पष्ट करते हैं: “हमारा शरीर ही युद्धक्षेत्र है। दो विचारों (उच्च और निम्न आवेग) का शाश्वत द्वंद्व इसमें चलते रहता है। इस निर्मल हृदय में कृष्ण वास करते हुए हमें मार्ग दिखाते हैं।” इसी संदर्भ को लेकर गाँधी अभय, अर्थात् भय से मुक्ति के गुणों को भी वर्णित करते हैं, जिसके बारे में भगवतगीता में विचार प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं:
जो भयभीत अपनी जान बचाना चाहता है......उसने देह के साथ संघर्ष करना चाहिए; वह करे या न करे, वह उसका धर्म नहीं है....इस अनूठे संसार में हिंसा अथक चलती रहेगी। भगवतगीता ही उससे मार्ग दिखाएगी। लेकिन वह यह भी बताती है कायरता और निराशा योग्य मार्ग नहीं है। कायरता से तो बेहतर है मरना या मारना।21
गाँधी स्पष्ट रूप से घोषणा करते हैं कि भगवतगीता यह प्रमाणित करती है कि शारीरिक युद्ध निरूपयोगी होता है और कार्य के फल का त्याग करने से वह मानव को “ईश्वर की तरह” बनने का उत्तम मार्ग दिखाता है। त्याग से स्व-शुचिता का मार्ग मिलता है और वास्तविकता का एहसास होता है। गाँधी ने कहा है कि अगर हिंदुओं को ईशोपनिषद की पहली कड़ी स्मरण में रहेगी तो हिंदू धर्म सदा के लिए बना रहेगा। वह कड़ी कुछ इस प्रकार है, “इस विशाल ब्रम्हांड में हम जहाँ भी देखते हैं वहाँ सर्वत्र ईश्वर व्याप्त है। उसका त्याग कीजिए और उसका आनंद लीजिए या ‘वह’ जो कुछ देता है उसका आनंद उठाईए, अन्य किसी की धनसंपत्ति या जायदाद की आसक्ति मत रखिए।”22 गाँधी का मानना है कि इस कड़ी के सार के आधार पर भगवतगीता में भाष्य किया गया है। यहाँ त्याग का जो महत्त्व प्रतिपादित किया गया है वह सिर्फ शारीरिक न होकर ‘पुनर्जन्म’ का प्रतिनिधित्व करता है। यह अज्ञानतावश किया हुआ कार्य नहीं है बल्कि सोचसमझकर की हुई क्रिया है। अत: यह पुनर्जीवन है.... अन्य किसी की जायदाद की आसक्ति मत रखिए। जिस क्षण आप इन विचारों के अनुसार मार्गाक्रमण करना प्रारंभ करते हैं आप इस विश्व में, अन्य जीवों के साथ शांति के साथ एक सज्जन व्यक्ति की तरह रह सकते हैं।’23
प्रारंभ में गाँधी ने दो आधारभूत अनासक्ति का उल्लेख किया है—सत्य और अहिंसा। सत्य का विचार पहले किया गया है। सत्य को प्रारंभ में ही सर्वोच्च (सत्ब्रह्म) कहा गया है, तो सत्य की आसक्ति को पूर्ण मुक्ति या श्रेष्ठ अनासक्ति समझा जा सकता है। सत्य के साथ बंधित होना अर्थात् अन्य सारे बंधनों से मुक्ति पाना है; जैसा गाँधी ने निर्विवाद रूप से कहा है, “हमारे अस्तित्व का कारण ही सत्य है।”24
अहिंसा को अनासक्ति का दूसरा आधार माना गया है। अब गाँधी बौद्ध और जैन परंपरा से विचार ग्रहण करते हैं। बुद्ध ने कहा था: “इस संसार में द्वेष से द्वेष की समाप्ति नहीं होती है ---प्रेम के कारण द्वेष समाप्त होता है.... मानव को सहृदयता से क्रोध को पराजित करना चाहिए, अच्छाई से दुष्टता को।”25 “नैतिक जीवन और मानवता के प्रति प्रेम” यह, बुद्ध के अनुसार सर्वोच्च समर्पण है। अहिंसा धीरे-धीरे अपनाने से सबके साथ मित्रता करने का पाठ हम सीख सकते हैं और फिर हमें आधारभूत एकात्मता की भावना की जानकारी होती है। गाँधी के विचारानुसार सत्य और अहिंसा के बीच अनुल्लंघनीय संबंध है। उनका कहना है, “सत्य ईश्वर है और अहिंसा ईश्वर का प्रेम है, और, किसी के बारे में दुष्टता का विचार आने से सत्य को चोट पहुँचती है, अत: सत्य की खोज करते समय अहिंसा ही आधार है।”26
गाँधी प्रसिद्ध बौद्ध सिद्धांत, “अहिंसा परमो धर्म:” (अहिंसा सर्वोच्च कर्तव्य है) को स्वीकार करते हैं। उन्होंने अहिंसा को विश्वव्यापी अर्थ दिया और निर्देशित किया, “अहिंसा निरंतर पीड़ा को आवश्यक करती है और सहनशक्ति में वृद्धि करती है।” कोई भी दुष्ट विचार, अनावश्यक जल्दबाजी, द्वेष और किसी के बारे में बुरा सोचना, और मारना अहिंसा का समर्थन करते हुए उससे दूर रहना चाहिए। अंततः गाँधी अहिंसा की व्याप्ति बढ़ाकर उसका सामान्य ‘स्नेह’ यह अर्थ बताते हैं, और ईसा के “सरमन ऑफ़ द माउंट” का सार भी अहिंसा में लाते हैं।
मगर सत्य और अहिंसा की प्राप्ति तन-मन पर अनुशासन रखने से ही हो सकती है।इस अनुशासन को ही तप (तन-मन में संतुलन) कहा गया है, जब मन की अवस्था पूर्णत: शांत होती है; जिस अवस्था में मानव का अपने आप पर और उसकी परिस्थिति पर पूरा नियंत्रण रहता है। यह ऐसा नियंत्रण है जो हमें अनासक्ति की ओर जाते हुए योगमार्ग के मूल तक ले जाता है। वैदिक काल से यह सर्वश्रुत है कि तप या आत्मसंयम से हम अतिन्द्रिय शक्ति प्राप्त कर सकते हैं।27
उपनिषद में तप के बारे में बताया गया है कि जिसके कारण आतंरिक सामर्थ्य की उत्पत्ति होती है। इसी आतंरिक सामर्थ्य को गाँधी शक्ति कहते हैं। उपवास, ब्रह्मचर्य और शारीरिक अनुशासन इस सामर्थ्य को प्राप्त करने के सिर्फ बाह्य साधन हैं। इस तरह से सत्य को जानने के लिए नैतिक व्यवस्था अर्थात् ‘शाश्वत आचरण के मार्गदर्शन’ का उल्लेख वे करते हैं। वे उन्हें इस प्रकार से विभाजित करते हैं– i) अहिंसा; ii) सत्य; (प्रमाणित करना) iii) अस्तेय; (चोरी नहीं करना) iv) अपरिग्रह; (संग्रह नहीं करना) v) ब्रह्मचर्य।28 वे इनको “पाँच संयम” कहते हैं। यह स्पष्ट है कि जिस तरह से कोई वैज्ञानिक अपने प्रयोग के लिए नियंत्रण निश्चित करता है, इन संयमों को स्वयंस्फूर्ति से निश्चित किया गया है।
गाँधी के सत्याग्रह में प्रारंभिक बिंदु, प्रतिज्ञा होती है; यह ‘सामर्थ्य की दीवार’ है, ऐसा उनका कहना है। और वे निर्दोष प्रतिज्ञा का आग्रह करते हैं (जैसे-उपवास और ब्रह्मचर्य); सत्याग्रह के लिए स्वयं अनुशासन और संयम अपेक्षित है। स्व-शुद्धिकरण की जब भी आवश्यकता महसूस होती थी, गाँधी उपवास करते थे, जिसे वे तप कहा करते थे। हरिजनों के लिए किए हुए उपवास से उच्च जातीवर्ग का हृदय शुद्ध करने का विचार था जिससे उनके मन से अस्पृश्यों के प्रति की घृणा दूर हो सके। उनकी इस बात पर श्रद्धा थी, “इस के कारण न केवल खुद का शुद्धिकरण होगा बल्कि कार्यकर्ताओं को भी ज्ञान होगा कि आंतरिक शुद्धि के बिना सच्ची हरिजन सेवा असंभव है।”29
संक्षेप में सत्याग्रह में प्रतिज्ञा के लक्षण निहित हैं। और इसमें अहिंसा भी समाविष्ट है; क्योंकि अहिंसा इसका दूसरा पूर्व लक्षण है: यह सक्रियता की मांग करता है, क्योंकि भगवतगीता में कर्मयोग को पूर्वापेक्षित लक्षण बताया गया है। इस पूर्वापेक्षित लक्षण के निष्कर्ष में महात्मा कहते हैं कि सत्याग्रही-नेता को “ईश्वर-पुत्र होना चाहिए जो प्रतिद्वंद्वी की श्रद्धा और प्यार को अपने खुद के जीवन की शुद्धता, नि:स्वार्थता और उसके विचारों की व्यापकता से प्राप्त कर सके।”30
सत्याग्रह के ये लक्षण कुछ प्रक्रियाएँ प्रस्तुत करते हैं, जिनकी गाँधी अपने सत्याग्रहियों से अपेक्षा करते हैं: “उनकी सभी क्रियाएँ पूर्णत: पारदर्शक होनी चाहिए। उसके अन्तरंग में कूटनीति या षड्यंत्र की थोड़ी सी भी मात्रा नहीं होनी चाहिए।31 परिणामत: सत्याग्रह गुप्त रूप से नहीं हो सकता है; सत्याग्रही के उद्देश्य स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से बताने होंगे।सत्याग्रह अभियान तब ही व्यापक आंदोलन बन सकता है जब इसमें भाग लेनेवाले अपेक्षित पूर्वलक्षणों की पूर्ति करें।
पूर्ववर्ती निष्कर्ष से ऐसा प्रतीत होता है कि गाँधी का असत्य और अन्याय का असहकार सत्याग्रह हिंदू लोक परंपरा के मूल में है। नेहरूजी ने इसे उस वक्त ग्रहण किया जब उन्होंने कहा कि “गाँधी एशिया की प्राचीन और आधुनिक क्रांतियों की कड़ी हैं।”32 इसी प्रकार टैगोर ने लिखा: “क्रान्ति के क्षेत्र में भारत ने एक नया इतिहास रचा है, जिसने हमारे देश की आध्यात्मिक परंपरा को बरकरार रखा है, और अगर इसकी शुद्धता बनी रहती है तो हमारी ओर से सभ्यता को यह एक सच्ची देन होगी।”33 आधुनिक काल में पोलैंड की एकता के आंदोलन में अहिंसक और शांतिपूर्ण तरीके से किसी व्यक्ति की नैतिक स्वायत्तता की क्रान्ति आधिकारिक सत्ता के विरोध में परिणामकारक सिद्ध हुई।
1 Young India, 3 September 1925. Also in The Collected Works of Mahatma Gandhi, Vol. 10, p. 248.
2 Young India, 12 October 1921, p. 1059.
3 Harijan, 2 June 1946.
4 Young India, 24 April 1924.
5 Heinrich Luders, Varuna (Goettingen, Vandenhoeck and Rupprecht, 1951), Vol. 1, pp. 40, 55; Vol. 2, p. 411.
6 George Dumezil. Mitra-Varuna (Leroux: Universitaires de France, 1940, Bibliotheque de l’ecole des Hautes Etudes, 56), pp. 79–146.
7 R.E. Hume, The Thirteen Principal Upanishads (London: Oxford Press, 1921), Taittiriya Upanishad 1–1: ‘He who knows Brahma as the real (satya) . . . obtains all desires.’
8 S. Dasgupta, Indian Idealism (Cambridge: University Press, 1933), p. 2.
9 Sir Monier Williams, Sanskrit-English Dictionary (Oxford: The Clarendon Press, 1894), p. 510.
10 Henrich Zimmer, Philosophy of India (New York: Meridian Books, 1956), p. 163.
11 S. Radhakrishnan, Eastern Religion and Western Thought (London: Oxford University Press, 1939), p. 353.
12 Sri Aurobindo, The Spirit and Message of Indian Culture (Pondicherry, 1946).
13 M.K. Gandhi, My Experiments with Truth (Ahmedabad: Navajivan Publishing House, 1956), p. 453.
14 Quoted in N.K. Bose, Studies in Gandhism (Calcutta: Nishan, 1947), p. 304.
15 M.K. Gandhi, An Autobiography: The Story of My Experiments with Truth (London: 1949), pp. 370–71.
16 Albert Schweitzer, Indian Thought (Boston: The Beacon Press, 1936), pp. 186–87.
17 R.E. Hume, op. cit., p. 369.
18 B.G. Tilak, Gita Rahasya, Vols. 1 and 2 (Bombay, 1935).
19 M.K. Gandhi, Hindu Dharma (Ahmedabad: Navajivan Publishing House, 1950), p. 155.
20 Ibid., p. 155.
21 Ibid., p. 156.
22 Ibid., pp. 41–42.
23 Ibid.
24 D.G. Tendulkar, Mahatma, Vol. 5 (Bombay, 1951–54), p. 380.
25 S. Radhakrishnan, Indian Philosophy, Vol. 1 (New York: Macmillan Company, 1923), p. 475.
26 M. K. Gandhi, For the Pacifists (Ahmedabad: Navajivan Publishing House, 1949), pp. 4–5.
27 एस. दासगुप्ता, उद्धरण, पृष्ठ 2-10; लॉडर्स, उद्धरण,खंड 2,पृष्ठ 644. ल्द्र्स का कहना है कि ऋग्वेद-X 190-91, में ऋत और सत्य की व्युत्पत्ति तप से हुई है।
28 M.K. Gandhi. Hindu Dharma, pp. 291–92.
29 M.K. Gandhi, Hindu Dharma (Ahmedabad: Navajivin Publishing House, 1950). p. 109.
30 M.K. Gandhi, Satyagraha (Ahmedabad: Navajivan Publishing House, 1951), p. 203.
31 Ibid.
32 Tibor Mende, Nehru: Conversations on Indian and World Affairs (New York: Braziller, 1956).
33 Quted in S. Radhakrishnan. Mahatma Gandhi (London: Allen and Unwin, 1939), p. 281.

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