किसी बदलाव के कारण प्राकृतिक वातावरण का दूषित होना ‘प्रदूषण’ कहलाता है। प्रदूषण, पर्यावरण में दूषक पदार्थों के प्रवेश के कारण प्राकृतिक संतुलन में पैदा होने वाले दोष को कहते हैं। प्रदूषण पर्यवरण को और जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रदूषण का अर्थ है—‘हवा, पानी, मिट्टी आदि का अवांछित द्रव्यों से दूषित होना, जिसका सजीवों पर प्रत्यक्ष रूप से विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान द्वारा अन्य अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ते हैं।’ पर्यावरण प्रदूषण का अर्थ होता है—मात्र मनुष्य के कार्यों द्वारा स्थानीय स्तर पर पर्यावरण की गुणवत्ता में हृस होता है।
प्रदूषण उत्पन्न करने वाले पदार्थों को प्रदूषक कहते हैं। प्रदूषक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं—
1. सूक्ष्म जीव द्वारा अपघटनीय
2. सूक्ष्म जीव द्वारा अनपघटनीय।
1. सूक्ष्म जीव द्वारा अपघटनीय : वे पदार्थ जो सूक्ष्म जीवों द्वारा अपघटित होकर अपने विषाक्त प्रभाव को खो देते हैं अपघटनीय प्रदूषक (Birdegradable Pollutants) कहलाते हैं; जैसे— वाहित मल (Sewage), जैवीय अवशिष्ट पदार्थ एवं कूड़ा-करकट आदि। ध्यातव्य है कि इन पदार्थों की एक सीमित मात्रा ही सूक्ष्म जीवधारियों (कवक एवं जीवाणु) द्वारा अपघटित हो पाती है। जब इनका आधिक्य हो जाता है तो इनका अपघटन सूक्ष्म जीवधारियों द्वारा नहीं हो पाता और ये पदार्थ हमारे वातावरण में प्रदूषण फैलाने लगते हैं।
2. सूक्ष्म जीव द्वारा अनपघटनीय : ऐसे पदार्थ जो सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटित नहीं हो पाते हैं, अनअपघटनीय प्रदूषक कहलाते हैं। ये आरंभ से ही हानिकारक होते हैं; जैसे—जहरीली भारी धातुएं—सीसा, पारा, आर्सेनिक कैडमियम, निकेल, मैंगनीज, लोहा, तांबा, जस्ता, बी.एच.सी.,डी.डी.टी. (D.D.T) फीरोल आदि रासायनिक यौगिक आदि। प्रदूषण के कई प्रकार हैं—वायु प्रदूषण , जल प्रदूषण , मृदीय प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण एवं ठोस अपशिष्ट प्रदूषण।
पृथ्वी का वातावरण स्तरीय है। पृथ्वी के नजदीक लगभग 50 किमी ऊंचाई पर स्ट्रेटोफीयर है जिसमें ओजोन स्तर होता है। यह स्तर सूर्य की पराबैंगनी किरणों को शोषित कर उसे पृथ्वी तक पहुंचने से रोकता है। आज ओजोन स्तर का तेजी से विघटन हो रहा है, वातावरण में स्थित क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस के कारण ओजोन स्तर का विघटन हो रहा है। यह सर्वप्रथम 1980 के वर्ष में नोट किया गया क ओजोन स्तर का विघटन संपूर्ण पृथ्वी के चारों ओर हो रहा है। दक्षिण ध्रुव विस्तारों में ओजोन स्तर का विघटन 40%-50% हुआ है। इस विशाल घटना को ओजोन छिद्र (ओजोन होल) करते हैं। मानव आवास वाले विस्तारों में भी ओजोन छिद्रों के फैलने की संभावना हो सकती है, परंतु यह इस बात पर आधार रखता है कि गैसों की जलवायु परिस्थिति और वातावरण में तैरती अशुद्धियों के अस्तित्व पर है। ओजोन स्तर के घटने के कारण धु्रवीय प्रदेशों पर जमा बर्फ पिघलने लगी है तथा मानव को अनेक प्रकार के चर्म रोगों का सामना करना पड़ रहा है। वाहनों तथा फैक्ट्रियों से निकलने वाली गैसों के कारण हवा (वायु) प्रदूषित होती है। मिलों से निकलने वाले कचरे को नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे जल प्रदूषण होता है। लोगों द्वारा कचरा फेंके जाने से भूमि (जमीन) प्रदूषण होता है जिससे पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है।
पृथ्वी के तापमान का लगातार बढ़ना ग्लोबल वार्मिंग की निशानी है। ग्लोबल वॉर्मिंग का सीधा अर्थ है—हर वर्ष पृथ्वी के धरातल के औसतन तापमान में वृद्धि होना। पृथ्वी के आसपास गैसों से भरे वातावरण की एक चादर है जिसमें हम रहते हैं और सांस लेते हैं। इस चादर में मुख्यतः दो गैसें यानी नाइट्रोजन और ऑक्सीजन बहुतायत में है। हमारे वातावरण में पानी की वाष्प, कार्बन डाई-ऑक्साइड और मीथेन गैसें भी प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं। पानी का वाष्पीकरण, कार्बन डाईऑक्साइड और मीथेन धरती की गरमी को सोखते हैं और नमी को बाहरी स्पेस में जाने से रोकते हैं जिसके कारण धरती का तापमान बढ़ता है। इसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहा जाता है। पानी के वाष्पाद्धकरण 50 प्रतिशत, कार्बन डाई-ऑक्साइड 26 प्रतिशत और मीथेन 9 प्रतिशत ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करते हैं और इसीलिए इन तत्वों को ग्रीन हाउस गैसें कहा जाता है। ये ग्रीन हाउस गैसें धरती पर ऐसा प्रभाव पैदा करती हैं जैसे कांच घर के शीशे गरमी को अपने अंदर से रोकते हैं। ग्रीनहाउस गैसों के आभामंडल से गुजरकर सूर्य की किरणें धरती पर पड़ती हैं तब धरती का धरातल, भूमि, पानी और वायुमंडल सूरज की ऊर्जा को अवशोषित करते हैं और फिर भी कुछ ऊर्जा वापस स्पेस में लौट जाती है। बहुतायत में यह ऊर्जा ग्रीन हाउस गैसों के कारण धरती पर रह जाती है। ग्रीन हाउस प्रभाव धरती के लिए बहुत उपयोगी है। इसके बिना धरती इतना गरम नहीं हो पाती जितना तापमान जीवधारियों और पौधों को जिंदा रहने के लिए जरूरी होता है, परंतु यदि यह ग्रीन हाउस प्रभाव बढ़ता तो यह धरती सामान्य से ज्यादा गरम हो जाएगी। धरती पर जरा-सा भी बढ़ा तापमान जीवधारियों और पौधों के लिए कई मुसीबतें ला सकता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछली एक सदी से धरती के औसत तापमान में 1 डिग्री फॉरेनहाइट वृद्धि हुई है। वैज्ञानिकों को पूरा विश्वास है कि आने वाले 200 वर्षों में हमारी धरती के औसत तापमान में 6 डिग्री फॉरनेहाइट की बढ़ोत्तरी हो जाएगी। धरती पर बढ़े इस तापमान से वर्षा के पैटर्न में विचित्र बदलाव होंगे, समुद्र का जल स्तर बहुत बढ़ जाएगा तथा धरती के पौधों और प्राणियों के जीवन बुरी तरह प्रभावित होंगे। धरती पर वातावरण के परिवर्तन संबंधी इंटर गवर्नमेंट पैनल यानी (IPCC) ने निष्कर्ष निकाला है कि ग्रीन हाउस गैसों के गंतव्य में वृद्धि का मुख्य कारण है कि पिछले 100 सालों में हमने जीवाश्म ईंधन, पेट्रोल, डीजल आदि का जमकर इस्तेमाल किया है तथा वनों की अंधाधुंध कटाई की है और औद्योगिक क्रांति के कारण धरती का तापमान गरमाने लगा है। कुछ तथ्य बेहद चौंकाने वाले हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि वातावरण में कार्बन डाई-ऑक्साइड का स्तर 0.53 प्रतिशत कण प्रति दस लाख कण की गति से बढ़ा है। पौधों में कार्बन डाई ऑक्साइड लेने की क्षमता घटी है, क्योंकि वनों का लगभग सफाया हो चुका है। मौजूदा काल में कार्बन डाई ऑक्साइड का गंतव्य 380 कण प्रति 10 लाख कण है तथा 2050 में यह गंतव्य बढ़कर 550 कण प्रति 10 लाख कण हो जाएगा। ग्रीन हाउस की अन्य गैसों के गंतव्य में भी आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हो रही है जो मानव जाति के लिए आने वाले खतरों की तरफ संकेत है। ग्लोबल वार्मिंग की मौजूदगी के प्रमाण हमारे सामने हैं। पिछले कुछ दशकों से लगातार बढ़ते गर्म तथा भयावह समुद्री तूफान जैसे सुनामी, कैटरीना आदि बताते हैं कि धरती का तापमान बढ़ने से इसके मिजाज में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। 26 जुलाई, 2005 में बंबई या बांबे (मुंबई) में भयानक बारिश हुई जिसमें एक ही दिन में रिकॉर्ड तोड़ 94 सेमी. वर्षा हुई थी।
यूरोप के कुछ देशों में ग्रीष्मकाल में तापमान 40 सेंट्रीग्रेड से अधिक होना ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रत्यक्ष संकेत हैं। ग्लेशियर वातावरण परिवर्तन के सबसे संवेदी सूचक माने जाते हैं। वैज्ञानिकों ने 1970 से लेकर अब तक मुख्य ग्लेशियरों की इन्वेंटरी बनाई और पाया कि हिमालय, अलास्का और एंडीज पर्वतमालाओं के ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। आर्कटिक कैप पिघल रही है। आर्कटिक इलाकों में साधारणतया गर्म क्षेत्रों वाले पौधों का उगना यह दिखाता है कि हम लोग बहुत जल्दी बहुत बड़ी मुसीबत में फंसने वाले हैं।

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