हमारे देश में जल प्रदूषण मुख्य रूप से जल में गंदगी के कारण होता है। लगभग 70 प्रतिशत जल देश में गंदा है। हमारी नदियां मुख्य रूप से प्रदूषित हैं, विशेष तौर पर नदियों के वे हिस्से जो शहरों के किनारे पड़ते हैं। शहरों की बड़ी आबादी का मल-जल, नालों एवं सीवरों के द्वारा नदियों में मिलता है। इसी प्रकार तालाबों, झीलों तथा समुद्र में भी गंदगी मिलती है। नदियों के किनारे कारखानों का भी बहा हुआ रसायन भी नदियों में गिरता है। 

इसके अतिरिक्त निम्न कारणों से भी जल प्रदूषित होता है—

कूड़ा-करकट पानी के अंदर फेंकना।

खेतों से बहकर आए खतरनाक रोगनाशक और कीटनाशक।

पानी में फेंके गए मरे हुए जानवर तथा मनुष्यों की लाशें।

पानी के पास शौच करना अथवा पेशाब करना।

प्रायः गंदे जल से पैदा हुई बीमारियों के कारण हमारे देश में प्रत्येक वर्ष आठ लाख लोग मारे जाते हैं।

स्व. प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के नेतृत्व में हमारी लोकप्रिय सरकारों ने सन् 1985 से गंगा कार्य योजना को लागू किया जिससे गंगा एवं उसकी सहायक नदियों का जल साफ हुआ है तथा नदियों के पानी को साफ करने के लिए रास्ता पता चला है। अभी गंगा के अतिरिक्त अन्य नदियों में बहुत काम बाकी है। अतः सरकार ने गंगा सहित यमुना, सतलुज, कृष्णा, कावेरी, ताप्ती, गोदावरी, गोमती, साबरमती, सुवर्ण रेखा, दामोदर, नर्मदा, चंबल, बेतवा, क्षिप्रा, बाण गंगा आदि नदियों की सफाई का कार्यक्रम चलाया है। इसके अंतर्गत नदियों के पानी का बी.ओ.डी. (B.O.D.) मानक 3 या इससे कम घुलित ऑक्सीजन 5 या इससे अधिक होना चाहिए तथा कुल कॉलीफार्म की मात्रा 100 मि. ली. पानी में 3500 से अधिक नहीं होनी चाहिए। 21वीं सदी में जानवरों एवं मनुष्यों को सीधे नदी से पानी पीना पड़ेगा, इसीलिए इन मानकों को कम-से-कम प्राप्त करना जरूरी है। 

जल प्रदूषण को कैसे रोका जाए

1. गांव में— गांवों में पानी के साधन अधिकतर खुले रहते हैं। उसमें धूल-खरपतवार इत्यादि पड़ते रहते हैं। घरों से निकलने वाला जल इनमें मिलता रहता है। तालाबों, नलकूपों के पास ही लोग एवं बर्तन एवं कपड़े साफ करते हैं तथा मैला वहीं बहा देते हैं। जानवर भी तालाबों में नहाते रहते हैं। गांवों के गंदे जल को एक ओर ले जाया जाए, तो उसमें कुछ पेड़ खूब बढ़ते हैं जैसे यूकेलिप्ट्स। घरों एवं सार्वजनिक स्थानों पर शौचालय खोले जाएं। नाबदानों एवं नालों को बहने से रोका जाए खेतों से कीटनाशक न बहकर जाएं। पानी में जलकुंभी जैसे पौधे उगाएं तथा मछलियां पालें, जो जल की गंदगी खत्म करती हैं। गांव के तालाबों, नदियों, झीलों में जानवरों को न नहलाएं और न ही उसके किनारे साबुन का प्रयोग करें। गांव में श्रमदान के माध्यम से यह कार्य हो सकता है।

2. समुद्र में— समुद्र के किनारे मकान, होटल और रेस्त्रां न बने। जब लोग समुद्रों की ओर घूमने जाएं तो वहां गंदगी न फैलाएं अथवा गंदगी समेटकर कूड़ेदान में ही डालें।

3. शहरों में— गंगा योजना के अंतर्गत लगाए गए मल-मूत्र उपचार यंत्र ही एकमात्र साधन हैं। इन पर काफी खर्चा आता है। शहरों में रहने वालों के स्वास्थ्य के लिए सरकार एवं स्थानीय नगर पालिकाओं को रुपया खर्च करना ही पड़ेगा। इस साफ जल में मछलियां पाल कर इसे और साफ किया जा सकता है तथा इसे खेतों में सिंचाई के लिए छोड़ दिया जाता है जिसमें साग, सब्जियों तथा फूल खूब पैदा होते हैं। इससे सफाई में अच्छी खाद्य निकलती है जो काफी अच्छी होती है तथा इसमें से निकलने वाली गैस का उपयोग शहर या कस्बे में बिजली बनाने में किया जाता है। ऐसा वाराणसी, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद एवं कलकत्ता (कोलकाता) सहित कई और शहरों में हो रहा है, पर इन संयंत्रों के साथ ही साथ ठीक-ठीक चलाने का पूरा प्रबंध होना चाहिए। इसके अतिरिक्त तालाबों को खोद कर भी इस मल-जल को खुली सूर्य की रोशनी में शुद्ध किया जा सकता तथा इसका उपयोग बागवानी तथा मछली पालने के लिए भी हो सकता है। कई स्थानों पर गंदा पानी सीधे पेड़ों के झुंडों में भेजकर उसकी गंदगी अर्थात् मल को अलग किया जाता है तथा उसे फिर गंगा में छोड़कर गंगा की सफाई का प्रयत्न किया गया है। विद्युत शवदाह भी बड़े-बड़े शहरों में लगाए जा रहे हैं, जिससे लाशों को जलाने से काफी कम खर्च आता है। इन शवदाह गृहों में लाशों जलाकर ही हमें जल प्रदूषण को दूर करने में सहयोग करना चाहिए। यह कार्य शास्त्र के विरुद्ध नहीं है।

सार्वजनिक शौचालय

सामुदायिक शौचालयों को सुलभ-शौचालय भी कहा जाता है। उनके माध्यम से शहरी लोगों को बड़ी राहत मिली हैं। बाहर से आने वाले यात्री या मजदूर, कुली या रिक्शेवाले थोड़ा पैसा देकर पेशाब या पाखाना जा सकते हैं। इनसे शहरों में सफाई बढ़ गई है। इन्हें जगह-जगह बनाया जा रहा है। आशा है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता आंदोलन से 2019 तक देश के सभी स्थानों पर शौचालयों की स्थापना हो जाएगी एवं यथेष्ट संख्या में सार्वजनिक स्थानों पर सामुदायिक शौचालयों का निर्माण कार्य पूर्ण हो जाएगा, साथ-साथ उनकी उचित निगरानी तथा सफाई की भी व्यवस्था होगी।

गंगा कार्य योजना की सफलता : सन् 1985 में गंगा कार्य योजना के लागू होने के बाद ऋषिकेश एवं हरिद्वार में मछलियां वापस आ गई हैं। संगम पर डॉलफिन देखी जा सकती है तथा भक्तगण बेफिक्र होकर डुबकी लगा सकते हैं। पटना में भी गंगा का जल साफ हो गया है। इसी प्रकार वाराणसी की गंगा में तैराक फिर से देखे जा सकते हैं।

गंगा कार्य योजना के द्वारा केवल 70 प्रतिशत गंदगी दूर करने का उद्देश्य था, पर आबादी बढ़ने के साथ गंदगी भी बढ़ती गई। फिर भी प्रायः 450 करोड़ रुपया खर्च करके हरिद्वार, ऋषिकेश, कानपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना तथा कलकत्ता (कोलकाता) समेत पच्चीस शहरों को बचाया जा सका है। प्रायः 84 करोड़ लीटर मल-जल को प्रतिदिन में गंगा में जाने से बचा लिया गया है।

गंगा कार्य योजना की सफलता तथा उसमें जनता की भागीदारी देखकर भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय द्वारा राष्ट्रीय नदी कार्य योजना आरंभ की गई थी, ताकि गंगा के मॉडल पर ही सभी राज्य सरकारें केंद्र सरकार से मिलकर देश की मुख्य नदियों को साफ करें एवं साफ रखें।

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही गंगा की सफाई पर जोर दिया है एवं गंगा की सहायक नदियों को भी इस कार्य योजना के अंतर्गत सम्मिलित किया है, क्योंकि इन नदियों की सफाई के बिना गंगा की सफाई अधूरी रहेगी। यह तो पांच वर्ष बाद ही पता लगेगा कि सुश्री उमा भारती के नेतृत्व में गंगा की सफाई में कितनी सफलता प्राप्त होगी। वैसे वर्तमान हालात पुरानी मंथर गति से चल रहे हैं।

जल प्रदूषण निवारण में छात्रों का सहयोग भी महत्वपूर्ण है—

छात्र छोटी कक्षा से ही पर्यावरण संबंधी शिक्षा ले रहे हैं।

वे गोष्ठियों, लेखन एवं वाद-विवाद, चित्रकारी प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं।

वे प्रभातफेरियां निकालकर जनता में जाग्रति ला रहे हैं।

विज्ञान के छात्र आसपास की नदियों, तालाबों, झीलों और कुंओं के जल को एकत्र कर अपने-अपने स्कूल की प्रयोगशालाओं में परीक्षण करते हैं तथा अपने माता-पिता, मित्रों एवं जान-पहचान के लोगों को उसकी सूचना देते हैं। इसमें नेशनल कैडेट कोर (N.C.C.), राष्ट्रीय सेवा योजना (N.S.S.) आदि संगठन इस ओर विशेष कार्य कर रहे हैं। 

बच्चे अपनी व्यक्तिगत सफाई का ध्यान रखें ताकि उनके गंदे हाथों के कारण खाने या पीने के साथ गंदगी उनके शरीर में न जाए एवं उन्हें बीमारी न हो। हम बाहर चाहे जितनी सफाई कर लें, यदि व्यक्ति अपनी सफाई नहीं रखेगा, तो साफ जल भी शरीर में पहुंचते-पहुंचते गंदा हो जाएगा।

स्कूलों, कॉलेजों, गांव, शहर में बड़े पैमाने पर पर्यावरण गोष्ठियां तथा लेखन प्रतियोगिता कराने की आवश्यकता है जिससे पर्यावरण संरक्षण की ओर लोग आकर्षित हों। विज्ञान के छात्रों को आस-पास की नदियों, तालाबों, झीलों एवं कुओं के जल को एकत्र कर अपने-अपने स्कूल की प्रयोगशालाओं में परीक्षण करने के लिए उत्प्रेरित किया जाए, क्योंकि यही बच्चे कल देश के नागरिक होंगे। शिक्षकों, अधिकारियों को प्रशिक्षित कार्यक्रमों द्वारा इस कार्य को करने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इस कार्य में एन.एन.सी. (N.C.C.), एन.एस.एस. (N.S.S.), युवक मंगल दल, समाजसेवी संस्थाओं, गांवों में पुरवा विकास समितियां, ग्राम पंचायत, ब्लॉक समितियां, जिला परिषदों द्वारा भी इस क्षेत्र में कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं। देश की 70% जनसंख्या गांवों में रहती है यदि उनको पर्यावरण संरक्षण की ओर मोड़ा जाए तो यह एक वरदान ही होगा। 

स्कूली छात्रों को शिक्षित करने के लिए गंगा परियोजना निदेशालय, इलाहाबाद द्वारा जल गुणवत्ता परीक्षण का अभियान चलाया गया। इसके अंतर्गत प्रदेश के लगभग 70 स्कूलों को जोड़ा गया, इसमें से लगभग 50 स्कूलों के एक हजार छात्र गंगा घाट पर जाते थे और वहां दी गई छोटी किटों के माध्यम से परीक्षण करते हैं एवं पानी का परीक्षण करते थे कि वहां पर कितना प्रदूषण था। वे जब गंगा नदी के किनारे जाते थे तो प्रदूषण करने वाले लोगों को रोकते भी थे, जिससे अन्य लोगों में प्रदूषण के विषय में जागरूकता उत्पन्न होती है। यद्यपि कभी-कभी परंपरा में बंधे लोगों के अवरोध का सामना भी करना पड़ता था, लेकिन उनका कार्य तो हो ही जाता था, क्योंकि लोगों के दिमाग में यह आ ही जाता है कि जब उनके बालक ऐसा कह रहे हैं तो एन.सी.सी. (N.C.C.) के लड़कों के माध्यम से रसूलाबाद घाट पर श्रमदान का आयोजन कराया गया एवं वाराणसी में कॉलेजों की लड़कियों, लड़कों ने घाट पर सांस्कृतिक कार्यक्रम किया। ये लड़के जब प्रयोग के बाद स्कूल आते हैं तो स्कूल में भी प्रदूषण के बारे में चर्चा होती है और क्योंकि स्कूल के अन्य लड़कों के दिमाग में आता है कि गंगा को प्रदूषण से मुक्त किया जाए एवं वे अपने घरों में जाकर इस प्रकार की चर्चा करते हैं। इससे उनके अंदर जल के प्रति भी अच्छी भावना आती है जिसका वे प्रतिदिन प्रयोग करते हैं। विदेशों में नई पीढ़ी में छात्रों के माध्यम से पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाई गई, क्योंकि पुरानी पीढ़ी के लोगों की आदतों को ठीक करना कठिन था। ये लोग जब पुराने होंगे तब यह नहीं होगा कि नदी के किनारे लोग गंदगी करेंगे एवं नई पीढ़ी के लोग प्रदूषण को रोकने के लिए भरसक अपने सामाजिक कर्तव्य का पालन करेंगे। संविधान के अनुच्छेद 51(क) के अनुसार भी सभी भारतीयों का कर्तव्य है कि वे पर्यावरण को ठीक रखें, जिसमें, तालाब, झील, नदी आदि आते हैं। यद्यपि हमारे देश में कई आंदोलन चलाए गए। एक ऐसा ही आंदोलन था जोकि स्कूल के छात्रों द्वारा कलकत्ता (कोलकाता) में प्रारंभ किया गया कि लोग चाय पीने के पश्चात् कुल्हड़ों को ठीक जगह फेंके। यह आंदोलन सफल हुआ क्योंकि जब ये छात्र चाय की दुकानों पर गए तो लोगों में उनका विरोध करने का साहस न हुआ। स्कूल के छात्रों का पर्यावरण के प्रति स्वतः लगाव होना स्वाभाविक है, क्योंकि भविष्य उनका है। अतः वे ही पर्यावरण के स्वच्छ रख-रखाव सुनिश्चित करेंगे। यह सत्य है बड़े-बड़े संयंत्र छात्र नहीं लगा सकते, पर जागरूकता आने पर यह कार्य भी वे सरकार से करा लेंगे। भविष्य में स्वच्छ पर्यावरण के लिए हमारा कर्तव्य है कि हम और अधिक प्रदूषित पर्यावरण भावी पीढ़ी के लिए न छोड़ें। यदि हम उसे और उन्नत बना सके तो उत्तम होगा, किंतु कम-से-कम भावी पीढ़ी के लिए जैसा पर्यावरण लिया था, वैसा तो छोड़े ही। 

इस कार्यक्रम में जनता की सहभागिता प्राप्त करने के मुख्य उद्देश्य निम्न प्रकार हैं—

  1. सामान्य तथा नदियों के प्रदूषण और विशेष रूप से गंगा के प्रदूषण की समस्याओं के बारे में जन-जागृति पैदा करना।
  2. गंगा की स्वच्छता के बारे में प्रधानमंत्री द्वारा दी गई पहल के महत्व की जानकारी देना।
  3. नदियों के उपयोग के बारे में सही दृष्टिकोण को लोगों को समझाना।
  4. गंगा कार्य योजनाओं में कार्य कर रहे लोगों को प्रोत्साहित करना तथा उनकी कार्य क्षमता को बढ़ाना।
  5. नदियों में गाद का भराव, भूमि संरक्षण, वनीकरण, औद्योगिक प्रदूषण, जलस्रोतों को बनाए रखना, जैसे विषयों में जानकारी को प्रोत्साहित करना।
  6. कार्य योजना के कार्यान्वयन में जन सहयोग और सहभागिता प्राप्त करना।

उद्योगों की जिम्मेदारी

भारत में जहां नए कारखानों की जरूरत है वहां दूसरी ओर कारखानों से होने वाली हानि के रोकथाम के उपाय भी आवश्यक हैं। कई कारखानों से निकलने वाला रसायन बहुत खतरनाक होता है। इसीलिए पर्यावरण कानून बनाकर कारखानों को इनका नियंत्रण करने के लिए जिम्मेदार बनाया गया है। इन उत्प्रवाह उपचार संयंत्रों (ई.टी.पी.) पर भी कुल लागत का 2% से अधिक खर्च नहीं आता है जोकि जूते में फीते की कीमत के बराबर होता है। इन उपायों से कारखानों में काम करने का वातावरण अच्छा हो जाता है एवं उत्पादन बढ़ जाता है। पास-पड़ोस के लोगों की भी सहानुभूति भी उद्योगों के प्रति बढ़ जाती है।

उद्योगों के मालिक या चलाने वाले व्यक्ति सम्मानित व्यक्ति हैं। उन्हें पर्यावरण को ठीक रखने के लिए स्वयं पूरा प्रयत्न करना चाहिए तथा इस क्षेत्र में एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए ताकि अपराधियों की भांति उन्हें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1956 के अंतर्गत जेल की हवा न खानी पड़े।

जन सहयोग की आवश्यकता

बिना जल सहयोग के पानी की गंदगी को दूर करना असंभव है। इसके लिए हमें निम्न संदेश याद रखने चाहिए तथा दूसरे तक पहुंचाना चाहिए—

  1. पानी के किनारे शौच न करें।
  2. नदी में कूड़ा-करकट नहीं फेंके।
  3. नहाते समय नदी में शैंपू और साबुन का प्रयोग न करें।
  4. पशुओं को नदी में न नहलाएं।
  5. नदी में कपड़े न धोएं।
  6. नदियों में मरे हुए जानवरों को नहीं फेंके।
  7. घरों में जलधौत शौचालय बनवाएं।
  8. इनके साथ-साथ उन लोगों का भी विरोध करें, जो जल प्रदूषण करते हैं। इसके बाद ही कानून एवं पुलिस का सहारा लिया       जाना चाहिए।


गंगा की सफाई एवं जन-जागृति

गंगा की सफाई, नदियों की प्रदूषण से मुक्ति तथा पर्यावरण के जन-आंदोलनों की आवश्यकता है ताकि सम्यक जन-जागृति हो सके। बिना जन-जागृति के जल-प्रदूषण पर लगाम असंभव है।

सरकार द्वारा नगरों में सीवर लाइनें डालना, मलजल शुद्धीकरण संयंत्र लगाना, विद्युत शवदाहगृहों का निर्माण, सुलभ शौचालय की स्थापना, गंगा के घाटों को पक्का बनाना तथा औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के साथ-साथ निम्न जन-जागृति एवं जन-भागीदारी संबंधी उपाय आवश्यक है—

1. घरों या उद्योगों से निकलने वाले मलजल से ठोस अपशिष्ट एकत्र करके कूड़ेदान में डालना चाहिए ताकि प्लास्टिक आदि खतरनाक ठोस पदार्थों से नालियां या सीवर लाइनें अवरुद्ध न हों।

2. सभी घरों में जलद्यौत शौचालयों का निर्माण हो, चाहे वे कम लागत की तकनीकी पर आधारित हों।

3. गांव, शहर, स्कूल, कॉलेजों में पर्यावरण गोष्ठियां, चित्रकारी, लेखन तथा वाद-विवाद प्रतियोगिताएं आयोजित हों।

4. विज्ञान के छात्र आसपास की नदियों, तालाबों तथा कुओं के जल को एकत्र करें। इस प्रकार उन्हें अपने-अपने स्कूल की प्रयोगशाला में गुणवत्ता परीक्षण के लिए उत्प्रेरित किया जाए।

5. विशाल पैमाने पर नागरिकों तथा एन.सी.सी. एवं एन.एस.एस छात्रों द्वारा गंगा या नदियों के किनारे सफाई हेतु श्रमदान आयोजित हों। स्वैच्छिक संस्थाओं, नेहरू युवक केंद्र, युवक मंगल दल, महिला मंडल, समाजसेवी संस्थाओं, गांवों में पुरवा विकास समिति या ग्राम-पंचायत, ब्लॉक समितियां, जिला परिषदों द्वारा भी इस क्षेत्र में कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं। अतः गंगा की सफाई के लिए गांव की सफाई भी आवश्यक है।

6. लोगों में जल प्रदूषण संबंधी जागरूकता पैदा करने के लिए बड़े पैमाने पर उनकी भाषा में विशेषतः कुंभ माघ मेला जैसे धार्मिक आयोजनों में पर्चे वितरित किए जाएं। दूरदर्शन, रेडियो पर प्रतिदिन जल-प्रदूषण, नदी-प्रदूषण एवं पर्यावरण संबंधी कार्यक्रमों की जानकारी दी जानी चाहिए ताकि जनता सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन पर दृष्टि रख सके। यदि सरकारें स्थानीय प्रतिनिधियों को लेकर मॉनिटरिंग समितियां बना दें, तो अति उत्तम होगा। गांवों में नौटंकियां, लोक-संगीत कार्यक्रम तथा मेले-त्यौहारों पर प्रदर्शनियां आयोजित होनी चाहिए तथा पर्यावरण संबंधी या जल संबंधी चलचित्रों को दिखाया जाना चाहिए।

7. रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का खेतों में कम-से-कम उपयोग किया जाना चाहिए। यदि उपयोग हो भी, तो यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे जल के साथ बहकर गंगा या नदी में न जाएं। डी.डी.टी./एल्डरीन के उपयोग पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।

8. नगरों एवं गांवों में कूड़ा-कचरे की मात्रा में कमी करने के लिए उनका पुनर्चक्रण किया जाना चाहिए या उसे जला देना चाहिए।

9. बाढ़, भूमि-स्खलन, सूखे तथा प्रदूषण के बचाव हेतु वृहद् स्तर पर वृक्षारोपण हो।

10. घाटों पर शौच, मल निस्तारण, साबुन से कपड़े धोना तथा बड़ी मात्रा में फूलों तथा दूध का नदी में निस्तारण बंद होना चाहिए।

11. वाराणसी में गंगा में प्रवाहित शवों को खाने के लिए कछुए छोड़े गए। इस प्रकार की अन्य और योजनाएं लेनी चाहिए ताकि जन-जागृति का विस्तार हो तथा जीव-जंतु भी इस अभियान में सम्मिलित हों।

12. जो उद्योग गंगा में प्रदूषण प्रवाहित कर रहे हैं या जिन सरकारी संयंत्रों का संचालन या रख-रखाव ठीक नहीं है, उनके नियंत्रकों के विरुद्ध पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत मुकदमे दायर होने चाहिए। दुःख है कि विभिन्न सरकारी वायरों के बाद भी गंगा निर्मलीकरण का कार्य समय पर पूरा न हो सका जिससे भारतीय जन-मानस असंतुष्ट हैं क्योंकि गंगा उसकी आस्था का प्रतीक है।

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