यह चाइना के महान सायकोलॉजिस्ट लाओत्से के जीवन का एक किस्सा है। मनुष्य के जीवन से संबंधित बातों पर उनकी पकड़ बड़ी अद्भुत थी। जल्द ही उनकी चर्चा चारों ओर फैल गई। दूरदराज से लोग उनसे ज्ञान लेने आने लगे। हालांकि लाओत्से के ज्ञान देने के तरीके बड़े अजीबोगरीब थे। कइयों की समझ में आते, कइयों के नहीं आते। पर चाहे जो हो, उनकी ख्याति चारों ओर फैलती ही जा रही थी। ...उड़ते-उड़ते उनके ज्ञान की चर्चा राजा तक भी पहुंची। राजा ने सोचा, जब इतने महान फकीर हैं और उनसे पूरा राज्य लाभ ले रहा है; तो मैं यह मौका क्यों छोडूं?
बस एक दिन अपने लाव-लश्कर के साथ वह भी लाओत्से के द्वार पर जा पहुंचा। उस समय वे अपने बगीचे में गड्ढ़ा खोद रहे थे। राजा ने तत्क्षण सिपाहियों को अपने आने की सूचना उन तक पहुंचाने को कहा। राजा ने सोचा कि मेरे स्वयं के आने की खबर पाते ही लाओत्से तो मारे खुशी के झूम उठेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ! सिपाही तो खबर देकर आ भी गए, पर वे अपना गड्ढ़ा खोदने में ही लगे रहे। राजा एक क्षण को तो चौंक गया, अपने ही सेवक-सिपाहियों के सामने उसे अपमान-सा भी महसूस होने लगा। पर उसने सब्र बनाए रखा। वहीं बगीचे के बाहर जोर-जोर से चहलकदमी करने लगा। उधर लाओत्से भी अपने कार्य में लगे ही रहे। कुछ वक्त और बीत गया पर लाओत्से नहीं आए तो नहीं ही आए। राजा पूरी तरह झल्ला उठा। यह फकीर है या पागल? कोई खास कार्य कर रहा होता या इबादत कर रहा होता तो समझ में भी आता था, पर यह तो गड्ढ़ा खोद रहा है और फिर भी मुझे इन्तजार करवा रहा है। एक क्षण को तो उसका मन लौट जाने को भी हुआ। ...फिर उसने सोचा, जब इतनी दूर आ ही गया हूँ तो मिलकर ही जाऊं। बस मारे बेचैनी के वह और तेज कदमों से चहलकदमी करने लगा।
उधर लाओत्से भी पक्का फकीर था। उसका अब भी अपनी पूरी तल्लीनता से गड्ढ़ा खोदना जारी ही था, लेकिन इधर बीतते समय के साथ अब राजा को क्रोध भी पकड़ने लगा था। वह लौट जाना भी चाहता था, पर अब उसको जिज्ञासा ने जकड़ लिया था। वह अब लाओत्से के इस व्यवहार का राज जाने बगैर जाना नहीं चाहता था। आया था ज्ञान लेने, लेकिन चूंकि ज्ञान देनेवाला ही उसे पागल जान पड़ रहा था तो ऐसे में अब ज्ञान वगैरह में उसकी रुचि बने रहने का सवाल ही नहीं उठता था। ...अब तो वह सिर्फ यह जानने को रुका हुआ था कि आखिर फकीर यह सब कर क्यों रहा है? यहां राजा इन्हीं सब उधेड़बुन में खोया रह गया और उधर लाओत्से महाराज अपना कार्य सलटाकर आ भी गए। उन्होंने आते ही राजा का स्वागत किया, इन्तजार करवाने हेतु क्षमा मांगी, और हाथोंहाथ भीतर चल आराम से विराजने का निवेदन भी कर डाला।
लेकिन राजा क्रोध में था। उसने लाओत्से के आग्रह को कोई तवज्जो नहीं दी। उल्टा वहीं खड़े-खड़े उसने उनपर सीधा क्रोध उड़ेलते हुए कहा- आया था ज्ञान लेने पर अब मुझे ज्ञान की कोई दरकार नहीं। मुझे यह बताओ कि एक साधारण से कार्य के लिए तुमने मुझे इतना इन्तजार क्यों करवाया?
प्रश्न सुनते ही लाओत्से ने एक क्षण को सीधे राजा की आंखों में झांका। ...फिर एकदम हँसते हुए बोले- जहां तक कार्य के मामूलीपन का सवाल है तो कार्य कोई भी बड़ा या छोटा नहीं होता है। और जहां तक ज्ञान का सवाल है, तो वह तो तुम ग्रहण करना चाहो या नहीं...पर अपनी ओर से तो मैं तुम्हें दे ही चुका हूँ।
दे चुका? ...राजा और बुरी तरह चौंक गया। अभी तो बातचीत ही नहीं हुई है। अभी तो मैंने कुछ पूछा भी नहीं है, और यह कहता है कि ज्ञान तो वह दे चुका है। यह पक्के में पागल है... फिर भी राजा की उत्सुकता तो जागी ही हुई थी। ऊपर से ज्ञान दे देने वाली बात कर उन्होंने राजा को एक नई उत्सुकता और पकड़ा ही दी थी। ...अब तो वह इस सोच में भी पड़ गया था कि क्या वाकई यह पागल है भी, या बन रहा है? क्योंकि यदि पूरा गांव इसे पहुंचा हुआ फकीर मानता है, तो फिर पूरा गांव तो पागल हो नहीं सकता। ...वैसे हो भी सकता है, मनुष्यों का क्या भरोसा? सो फैसला तो करके ही जाना है, लाओत्से पागल हैं या गांव, या दोनों, या कोई नहीं। सो बस, इस उधेड़बुन से निकलने हेतु अबकी उसने बड़ी संजीदगी से फकीर से पूछा- बताइए आपने क्या ज्ञान दिया? जबसे आया हूँ तब से आप गड्ढ़ा ही तो खोद रहे हैं।
लाओत्से बड़े ही करुणा से भरे अंदाज में बोला- यहीं तो मार खा गए महाराज आप। आपने ध्यान से देखा ही नहीं... दरअसल मैं गड्ढ़ा खोद नहीं रहा था, बल्कि उस दरम्यान गड्ढ़ा खोदने की क्रिया हो चुका था। यदि आप ध्यान से गड्ढ़ा खोदने में मेरी ऐसी तल्लीनता देख लेते तो सबकुछ सीख जाते। ...क्योंकि जीवन में ऐसी तल्लीनता व ऐसी दीवानगी को छोड़ और कुछ सीखने लायक नहीं है।
सार:- यदि आप जीवन में बड़ी सफलता चाहते हैं तो कार्य व क्रिया का संबंध अच्छे से समझ लीजिए। किसी भी कार्य के होने में दो चीजें शामिल होती हैं, एक कार्य करनेवाला और दूसरा उसके द्वारा की जा रही क्रिया। और इसे प्रकृति की त्रिगुणी माया के आधार पर तीन भागों में विभाजित करूं तो अधिकांश समय कार्य करनेवाला तो होता है, परंतु उसका क्रिया पर ध्यान बिल्कुल नहीं होता है। अधिकांश लोग इसी कैटेगरी में आते हैं और इसीलिए उनके किसी भी कार्य का जीवन में कोई परिणाम नहीं आ रहा है। दूसरी कैटेगरी में वे लोग आते हैं जो कार्य करनेवाले को और की जानेवाली क्रिया को अलग-अलग जानते हैं तथा उसी हिसाब से कार्य करते हैं, ऐसे लोग दस हजार में एक की सफलता पा रहे हैं। लेकिन लाखों में एक व्यक्ति ऐसा भी होता है जो कार्य में इतना डूब जाता है कि सिर्फ कार्य रह जाता है और करनेवाला गायब हो जाता है। ...और ऐसे लोग ही ऐतिहासिक सफलता पाते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि नृत्य तो हो परंतु नृत्यकार गायब हो, तो ही चमत्कार होता है। ...बस आप भी यह कला सीख जाएं, फिर जीवन में ऐतिहासिक सफलता दस्तक न दे तो कहना।

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