...गरीब परिवार का एक होनहार नवयुवक था। उसने अपनी प्रतिभा के जोर पर एक अच्छे गुरुकुल में दाखिला पाया। अब चूंकि बात पुराने जमाने की है, सो गुरुकुल में एक उसको छोड़ बाकी विद्यार्थी या तो राजकुमार थे या संभ्रांतों के बेटे थे। धीरे-धीरे उनके वट की बातें सुन-सुनकर युवक के मन में धन कमाने की इच्छा जागृत होने लगी। ...उधर गुरु बड़े ही समझदार थे, वे उस नवयुवक के मन में तेजी से पनप रही धन कमाने की इच्छा को अच्छे से भांप गए थे। सो जैसे ही उसकी शिक्षा समाप्त हुई और उसने गुरु से गुरुदक्षिणा के बाबत पूछा कि तत्क्षण गुरु ने कहा- तू मेरी खातिर धनवान बन। बस यही तेरी मुझे गुरुदक्षिणा होगी। आज से तू धन कमाना ही अपने जीवन का उद्देश्य रख। ...गुरु वाकई समझदार थे। उन्होंने यह कहकर शिष्य की दबी इच्छा को सतह पर ला दिया था। गुरु की बात भी सही थी, दबी इच्छा से बड़ा पाप क्या?

खैर! यह तो गुरु की सोच हुई। शिष्य की बात करें तो उसको तो जो चाहिए था वह मिल गया था। वह गुरु का आशीर्वाद लेकर धनपति बनने निकल पड़ा। ...और शिष्य का भाग्य देखो कि एक दिन उसे एक ऐसे राजा के बारे में मालूम पड़ा जो बड़ा ही दिलदार था। उसका यह नियम था कि सुबह-ही-सुबह जो पहला व्यक्ति उसके राजमहल में प्रवेश करता था, उसे वह मुंहमांगा दान देता था। युवक की तो मानो लॉटरी ही लग गई। वह एक लंबी यात्रा कर पहुंच गया उस राजा के राज्य में। लेकिन दुर्भाग्य से उसका राज्य-प्रवेश संध्या को हुआ था। कोई बात नहीं, सुबह क्या दूर थी? ...लेकिन देखा जाए तो बहुत दूर थी। आपको भी अनुभव होंगे ही कि कोई बड़ी तमन्ना पूरी होने का घंटे-भर का इन्तजार भी कितना लंबा हो जाता है। जबकि इसे तो पूरी रात काटनी थी। ...सो, उसने सोचा क्यों न अभी से ही राजमहल के बाहर डट जाऊं। कहीं ऐसा न हो सुबह लेट हो जाऊं और कोई दूसरा पहले पहुंच जाए।

अब रात का डटा हुआ था, सो अगले दिन स्वाभाविक तौरपर राजमहल में पहला प्रवेश उसी ने पाया। नियमानुसार राजा ने उसे जो चाहे मांगने को कहा। उसे तो विश्‍वास ही नहीं हुआ, वह हड़बड़ा भी गया। वह आ तो पहुंचा था, परंतु वास्तव में ऐसा कोई राजा हो भी सकता है, इस बात का उसे पूरी तरह यकीन नहीं था। भीतर-ही-भीतर वह इसे अफवाह और कहानी मान ही रहा था। उधर उसे इस तरह भौंचक्का देख राजा ने अपनी बात दोहराते हुए कहा- बेझिझक होकर जो चाहो मांग लो।

शिष्य सोच में पड़ गया। गरीब था, मन में यही आ रहा था कि क्या तो न मांग लूं। सोचा, हजार स्वर्ण मुद्राएं तो मांग ही लेनी चाहिए। फिर लोभ पकड़ा, जब दे ही रहा है तो क्यों न दस हजार मुद्राएं ही माग लूं। फिर तो पलभर में लाख पर पहुंच गया। लेकिन अब तो उसने उड़ानें भरना शुरू कर दी थी, उसने सोचा क्यों न पूरा राजपाट ही मांग लूं? बस यह बात उसको जंच गई और उसने पूरा राजपाट ही मांग लिया। उधर राजा भी कमाल था। यह सुनते ही वह तो खुश-खुश हो गया। और उसी खुशी में बोला भी- अहो! अब कहीं जाकर मेरी जान छूटी।

अब यह शिष्य भी तो पक्के गुरु के यहां पढ़ा हुआ था। तुरंत होश में आ गया। जरूर राजपाट में कुछ तो ऐसा छिपा ही हुआ है जो राजा ऐसा कह रहा है। तो फिर मुझे तो उसके अनुभव पर भरोसा करना ही चाहिए। उसकी जान छुड़ाने हेतु मैं क्यों इस अनजान में डुबकी लगाऊं? बस उसने तुरंत राजा से क्षमा मांगी और वहां से भाग खड़ा हुआ। और इस एक ध्यानपूर्वक के अनुभव से उसकी धन कमाने की और सत्ता पाने की इच्छा तो हमेशा के लिए ऐसी छू हो गई कि पूछो ही मत।

सार:- बस, यही मैं कह रहा हूँ। इच्छा है तो भोगना जरूर, पर ऐसा ध्यान और ऐसी प्रज्ञा बनाए रखना कि उससे जल्द-से-जल्द छुटकारा हो जाए। अपनी इच्छा से छूटना महानता है। हां, लेकिन इतना ध्यान रख लेना कि इच्छा दबाना या उसी इच्छा के लिए जीना, दोनों जीवन के लिए घातक हैं। ...दरअसल मनुष्य का जीवन बड़ा ही सीधा व सरल है। उसमें दुख को जगह है ही नहीं। परंतु जीवन मन से चलता है, और मन के व्यवहार का जगत को बहुत कम अंदाजा है। वहीं मनुष्य का मन भी कोई कॉम्प्लीकेटेड इन्स्ट्रुमेन्ट नहीं है। परंतु चूंकि वह पूरी तरह नियम से बरतता है, और आम लोगों को नियमों का ज्ञान है नहीं; इसलिए उन्हें वह कॉम्प्लीकेटेड लगता है। बाकी तो जो नियम से बरत रहा हो उसके नियम जान लो, सारे कॉम्प्लीकेशन स्वत: ही समाप्त हो जाएंगे। और वर्तमान संदर्भ में मन का यह सीधा नियम समझ लो कि एकबार मन ने जिस चीज की इच्छा पकड़ ली, उसे भोगे बगैर तथा भोगकर उसकी व्यर्थता जाने बगैर, उस वस्तु से उसका छुटकारा नहीं। फिर भले ही पलभर को मानसिक तौरपर भोगकर ही वह उसकी व्यर्थता समझ ले, परंतु पकड़ी इच्छा से छूटने हेतु उसे पलभर तो पलभर ही सही; अपने मन में जागी इच्छा को भोगना तो पड़ेगा ही। अब यह तो सीधा और साफ सत्य है, परंतु इसके बावजूद यहां हरकोई बिन भोगे छोड़ने के चक्कर में पड़ा हुआ है, और जितना वह छोड़ने का प्रयास कर रहा है, उतनी ही वह इच्छा उसकी तीव्र होती जा रही है। यही कारण है कि पकड़ी कोई इच्छा, हजार दुख देने के बाद भी मनुष्य से छूट नहीं रही है। लेकिन आप समझदार हैं, बिन भोगे त्यागने के चक्कर में पड़ें मत, और भोगते वक्त होश बनाए रखें, मैं वादा करता हूँ कि जीवन की तमाम व्यर्थताओं से जल्द ही आपका छुटकारा हो जाएगा। वहीं किसी इच्छा बाबत; भोगते रहो, भोगते रहो और बस भोगते ही रहो के चक्कर में भी मत पड़ना। वरना पूरा जीवन उसी इच्छा बाबत ‘‘और...और’’ की रट लगाने में बीत जाएगा। और मृत्यु भी उस इच्छा के ‘‘और-और’’ की मानसिक दशा में ही आएगी। अत: इच्छा जागी है तो भोगो जरूर, हां ध्यान उससे जान छुड़ाने पर भी बनाए रखो। फिर से कोई बांसुरी न बजने लगे, इस हेतु नजर बांस के समूल उच्छेद पर बनाए रखनी है। और यही मनुष्य के जीवन का अंतिम सोपान हैं।

Post a Comment

Previous Post Next Post