हिमालय में ग्लेशियर का पिघलना कोई नई बात नहीं है। सदियों से ग्लेशियर पिघलकर नदियों के रूप में लोगों को जीवन देते रहे हैं, लेकिन पिछले दो दशकों में इनके पिघलने की गति में जो तेजी आई है, वह चिंताजनक है। सौ साल पहले तक स्थिति यह थी कि ग्लेशियर पिघलते थे, फिर भी इनका दायरा हर साल बढ़ रहा था। खूब बारिश और बर्फबारी से ग्लेशियर लगातार बर्फ से ढके रहते थे। मौसम ठंडा होने की वजह से ऊपरी इलाकों में बारिश की बजाय बर्फबारी होती थी, लेकिन 1930 के आते-आते मौसम बदला और बर्फबारी में कमी आने लगी। असर ग्लेशियर पर भी पड़ा। ये बढ़ने की बजाय पहले स्थिर हुए, फिर पिघलते ग्लेशियर का दायरा घटने लगा। 1950 के दशक तक इनका दायरा 3-4 मीटर प्रतिवर्ष तक कम होने लगा। यह गति धीरे-धीरे और बढ़ गई। 1990 व 2000 में इसमें काफी तेजी आ गई।
गंगोत्री ग्लेशियर पिछले दो दशक में हर साल 5 से 20 मीटर की गति से पिघल रहा है। उत्तराखंड के अन्य पांच प्रमुख ग्लेशियर सतोपंथ, मिलाम, नीति, नंदा देवी और चौराबड़ी भी लगभग इसी गति से पिघल रहे हैं। भारतीय हिमालय में कुल 9975 ग्लेशियर हैं। इनमें से 900 ग्लेशियर सिर्फ उत्तराखंड हिमालय में हैं। इन ग्लेशियरों से 150 से अधिक नदियां निकलती हैं, जो देश की 40 फीसदी आबादी को जीवन दे रही हैं। अब इसी बड़ी आबादी के आगे संकट है। हाल के दिनों में हिमालय राज्यों में जंगलों में जो आग लगी वह ग्लेशियरों के लिए नया खतरा है। वनों में जो आग लगी वह ग्लेशियरों के लिए नया खतरा है। वनों में आग तो पहले भी लगती रही है, पर ऐसी भयानक आग काफी खतरनाक है। आग के धुएं से ग्लेशियर के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलेगी। इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। काला धुआं कार्बन के रूप में ग्लेशियरों पर जम जाएगा, जो भविष्य में उस पर नई बर्फ को टिकने नहीं देगा।
ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकना तो सीधे हमारे बस में नहीं है, लेकिन हम ग्लेशियर क्षेत्र में बढ़ती मानवीय गतिविधियों को रोककर ग्लेशियरों पर प्रदूषण के प्रभाव को कम कर सकते हैं। इस क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के अलावा कई ऐसी तकनीक है, जिनसे बर्फ और ग्लेशियर को लंबे समय तक बचाया जा सकता है। उच्च हिमालयी में रहने वाले लोग पुराने समय में बरसात के समय छोटी-छोटी क्यारियां बनाकर पानी को रोक देते थे। तापमान 0 से नीचे जाने पर यह पानी जमकर बर्फ बन जाता। इसके बाद स्थानीय लोग इस पानी पर नमक डालकर मलबे से ढंक देते थे। लंबे समय तक यह बर्फ जमी रहती और गर्मियों में लोग इसी से पानी की जरूरतें पूरी करते हैं। इसी तरह स्नो हॉर्वेस्टिंग का काम भी होना चाहिए। बर्फ की बड़ी सिलियों को मलबे में दबाकर रखा जा सकता है, जो लंबे समय तक बर्फ को जीवित रख सकती हैं। अब इन पुराने उपायों को फिर से अपनाने की ज्यादा जरूरत है।
उत्तर पूर्व ग्रीनलैंड की विशाल हिम चादर बहुत तेजी से पिघलने लगी है, जिससे आगामी दशकों में अस्थिरीकरण और दुनियाभर में समुद्र का स्तर बढ़ेगा। वैज्ञानिकों ने पाया है कि 2012 की गर्म हवा और समुद्र के तापमान से जाचारिया इस्ट्रोम हिम चादर नीचे समुद्र की ओर खिसक रही है। इस ग्लेशियर में इतना अधिक पानी है कि दुनियाभर में समुद्र के स्तर में आधे मीटर की वृद्धि हो सकती है। उन्होंने कहा है कि इस बर्फ का वेग 3 गुना हो गया, जिससे उसका पिघलना काफी तेज हो गया। कंसास विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर रिमोट सेंसिंग ऑफ आइस सीड्स के जॉन पाडेन ने कहा कि हिमनद विज्ञान की भाषा में बर्फ का पिघलना तेजी से हो रहा है। कुछ ही पीढ़ियों में बर्फ के पिघलने से समुद्र स्तर में बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। पाडेन ने कहा—‘जब आप उन सभी हिमनदों को जोडे़ंगे, जो खिसक रहे हैं तो इससे बड़ी तादाद में लोगों को फर्क पड़ेगा। पिछली सदी में समुद्र स्तर बढ़ गया है, लेकिन आने वाले समय की तुलना में अभी महज कुछ लोग ही प्रभावित हुए हैं।
ग्लेशियरों को हिंदी में हिमानी या हिमनद कहा जाता है। हिमानी या हिमनद ( Glacier ) पृथ्वी की सतह पर विशाल आकार की गतिशील बर्फराशि को कहते हैं जो अपने भार के कारण पर्वतीय ढालों का अनुसरण करते हुए नीचे की ओर प्रवाहमान होती है। ध्यातव्य है कि यह हिमराशि सघन होती है और उसकी उत्पत्ति ऐसे इलाके में होती है जहां हिमपात की मात्रा हिम क्षय से अधिक होती है और प्रतिवर्ष कुछ मात्रा में हिम अधिशेष के रूप में बच जाता है। वर्ष-दर-वर्ष हिम के एक कण से निचली परतों के ऊपर दबाव पड़ता है और वह सघन हिम (ice) के रूप में परिवर्तित हो जाती है। यही सघन हिम राशि अपने भार के कारण ढालों पर प्रवाहित होती है जिसे हिमनद कहते हैं। प्रायः यह हिमखंड नीचे आकर पिघलता है और पिघलने पर जल देता है। पृथ्वी पर 99% हिमानियां ध्रुवों पर ध्रुवीय हिम चादर के रूप में है। इसके अलावा गैर-ध्रुवीय क्षेत्रों के हिमनदों को ‘अल्पाइन हिमनद’ कहा जाता है और ये उन ऊंचे पर्वतों के सहारे पाए जाते हैं जिन पर पूरे वर्ष ऊपरी हिस्सा हिमाच्छादित रहता है। ये हिमानियां समेकित रूप से विश्व के मीठे पानी (Fresh Water) का सबसे बड़ा भंडार है और पृथ्वी की धरातलीय सतह पर पानी का सबसे बड़ा भंडार भी है। हिमानियों द्वारा कई प्रकार के स्थल रूप भी निर्मित किए जाते हैं, जिनमें प्लेस्टोसीन काल के व्यापक हिमाच्छादन के दौरान बने स्थल रूप प्रमुख हैं। इस काल में हिमानियों का विस्तार काफी बड़े क्षेत्र में हुआ था और इस विस्तार के दौरान और बाद में इन हिमानियों के बने निवर्तन से बने स्थल रूप उन जगहों पर भी पाए जाते हैं जहां आज शीतोष्ण या उच्च शीतोष्ण जलवायु पाई जाती है। वर्तमान समय में भी हिमानियों का निवर्तन जारी है और कुछ विद्वान इसे हिम युग के समापन की प्रक्रिया के तौर पर मानते हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़ जैसे हालात रहेंगे। समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है।
दरअसल जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर्स पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर खुद वैज्ञानिकों में भी विवाद रहा है। कई वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को ग्लेशियर के पिघलने की वजह से इनकार करते रहे, लेकिन हाल के सालों में वैज्ञानिकों के बीच में आम राय बन चुकी है कि पिघलते ग्लेशियर्स बढ़ते तापमान का ही असर है और जल्द ही इसे रोकना होगा अन्यथा पूरी दुनिया पानी में
डूब जाएगी।

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