यह कहानी भारत के महान संत रामकृष्ण परमहंस के जीवन की है। वे उन दिनों बड़ी गरीबी में जी रहे थे। यह देख उनके कुछ चाहनेवालों ने उन्हें राजकीय मंदिर का पुजारी नियुक्त करवा दिया। वह राजकीय मंदिर बड़ा प्रसिद्ध था। अत: वहां की सारी व्यवस्थाएं भी नियमित और सुसंचालित थी। उस मंदिर में वर्षों से दोनों वक्त सुबह और शाम को ठीक सात बजे पूजा तथा आरती होती थी। निश्चित ही उसमें हजारों श्रद्धालु एकत्रित होते थे। रामकृष्ण परमहंस का भी यही कार्य था कि दोनों वक्त ठीक सात बजे श्रद्धालुओं के साथ मिलकर पूजा कर ले।

लेकिन रामकृष्ण तो ठहरे रामकृष्ण! वे कर्मों में बेईमानी तो कर नहीं सकते थे। उनके लिए तो उनकी हृदय की सच्चाई ही हुक्म, वो ही पूजा और वही कर्तव्य था। सो, होने यह लगा कि पुरानी परंपरा के अनुसार वहां सात बजे भक्तों का मेला तो लग जाता, लेकिन रामकृष्ण पूजा न करते। दो-चार दिन ही बीते होंगे कि एक दिन अचानक भरी दोपहर को रामकृष्ण ने पूजा प्रारंभ कर दी। उस समय मंदिर में बमुश्किल दस-बीस भक्त ही मौजूद थे। फिर तो कुछ दिन बाद हद ही हो गई। एक रात दो बजे जब मंदिर में कोई नहीं था, उन्होंने जमकर पूजा की।

उधर राजकीय मंदिर की पूजा में समय की ऐसी लापरवाही से भक्त निराश हो गए। धीरे-धीरे भक्तों का आना काफी कम हो गया। जब वक्त पर पूजा ही नहीं होती तो आने का फायदा क्या? उसी दरम्यान एक दिन स्वयं महारानी संध्या को पूजा करने आ पधारी। ...परंतु रामकृष्ण को इससे क्या? उस दिन भी साढ़े सात बज गए लेकिन पूजा नहीं हुई। इधर महारानी ने यह भी गौर किया कि मंदिर में भक्तों की तादाद काफी कम हो गई है। पूछने पर उन्हें बताया गया कि जब से यह पागल पुजारी नियुक्त हुआ है तभी से ऐसा हो रहा है। यह कभी नियत समय पर पूजा करता ही नहीं। और कभी-कभी अचानक देर रात जोर-जोर से पूजा करना शुरू कर देता है। बस समय की ऐसी अनियमितता से निराश होकर लोगों ने आना-जाना कम कर दिया है। 

स्वाभाविक रूप से महारानी तो बुरी तरह चौंक गई। उन्होंने सबके सामने ही रामकृष्ण से उनके इस व्यवहार की सफाई मांगी। रामकृष्ण ने हँसते हुए कहा- पूजा तो आती है तभी होती है। उसके आने का समय आप तय नहीं कर सकतीं। कभी-कभी वह दिन में चार बार आ जाती है, और कभी-कभी वह सात-सात दिन तक नहीं आती। भला पूजा करनेवाला मैं कौन होता हूँ? मैं तो पूजा निकालनेवाला हूँ। जब भी और जितनी भी आती है, निकाल देता हूँ।

महारानी तो रामकृष्ण का ऐसा जवाब सुनते ही गहरी सोच में डूब गई। उन्होंने रामकृष्ण की आंखों में झांका। उन आंखों की सच्चाई देख वह चकित रह गई। उन्हें वास्तविक पूजा का अर्थ समझने में देर नहीं लगी। बस उन्होंने तत्काल रामकृष्ण को उस मंदिर का स्थायी पुजारी नियुक्त कर दिया। साथ ही पूजा के समय बाबत भी सारे प्रतिबंध उठा लिए गए। अब रामकृष्ण जैसे सच्चे भक्त को पूजा बहने देने हेतु भगवान के पट खोलने की भी क्या आवश्यकता? कई बार ऐसा होने लगा कि मंदिर के पट बंद ही हों और भीतर रामकृष्ण की पूजा चल रही है। अब जिसके भीतर इतनी ईमानदारी हो उसकी पूजा तो सफल होनी ही है। उन्हें तो महान संत रामकृष्ण होना ही था। साथ ही उनके सानिध्य-मात्र से नरेंद्र को भी महान विवेकानंद में रूपांतरित होना ही था।

सार:- कर्म कोई भी हो, यदि करना पड़ रहा है, तो इसका मतलब साफ है कि उस कार्य में मन पूरी तरह लगा हुआ नहीं है। और मनुष्य जो भी कर्म बेमन से करता है, उसके कोई परिणाम कभी नहीं आते हैं। वहीं दूसरी तरफ यह भी समझ लें कि मनुष्य कोई भी कर्म अपनी मर्जी से अपने समय पर डूब के नहीं कर सकता है। यह हमारा एक बहुत बड़ा साकोलॉजिकल अज्ञान है जो हम एक-दूसरे को सुबह-शाम बांटते रहते हैं कि ‘‘कर्म में मन लगाओ’’। यह बात ही गलत है, कर्म में मन लगाया ही नहीं जा सकता है। ...यह भी अपने-आप में एक बहुत बड़ा गणित है। दरअसल कर्म में मन अपने समय पर और अपनी रुचि के क्षेत्र में ही लग सकता है। अर्थात् जिसका संगीत में मन लगता है, उसका पढ़ाई और व्यवसाय में भी ऐसा ही मन लगे; जरूरी नहीं। गौर करनेवाली बात यह कि यह गणित पूरी तरह पक्का होने के बावजूद इसे समझा या समझाया भी नहीं जा सकता है। ...इसका तो बस मन की गहराइयों में अनुभव किया जा सकता है। और जो व्यक्ति इस गणित को अपने भीतर जितना ज्यादा अनुभव करता है, वह उतना ही जागा हुआ है। तथा जो जितना जागा हुआ है, वह उतना ही सुख और सफलता का अधिकारी है। 

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