जब अपने विश्‍व के आप ही भगवान हो, तो दूसरे किसी भगवान को आपके विश्‍व में रत्तीभर दखलंदाजी का अधिकार हो ही कैसे सकता है? यहां का सीधा नियम है कि आपको अपने ही मानसिक कर्मों का हिसाब चुकाना पड़ रहा है। परंतु यह सीधा सत्य भी न समझने के कारण मनुष्य की हास्यास्पद हालत अब ऐसी हो गई है कि वह जो कर सकता है, वह कर नहीं रहा; और जिसे भगवान मान पूज रहा है, और जिसे वह भगवान कह रहा है, उसे उसके जीवन में कुछ करने की सत्ता ही नहीं है।

चलो, इस बात को मैं हिंदू धर्म के एक प्रसिद्ध पुराण की एक खूबसूरत कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ। इस कहानी में विष्णु को भगवान दर्शाया गया है तथा उनका एक भक्त है ‘नारद’, जो दिन में हजारों बार मौके-बेमौके व कारण-अकारण ‘नारायण-नारायण’ कह के भगवान का नाम लेता रहता है। ...इस कारण धीरे-धीरेकर नारद को यह गलतफहमी हो जाती है कि इस विश्‍व में भगवान का उससे बड़ा कोई भक्त ही नहीं। एक दिन अपनी इसी गलतफहमी को सहलाने के विचार से वे विष्णु के पास पहुंच जाते हैं। उनके चरणों में प्रणाम कर अहंकार पकड़े नारद थोड़ा तनते हुए विष्णु भगवान से पूछते हैं- प्रभु! क्या आपका मेरे से बड़ा भी कोई भक्त है?

सवाल सुनते ही विष्णु हँस पड़ते हैं और हँसते हुए ही कहते हैं- हजारों हैं।

...नारद का तो जैसे पूरा नशा ही उतर जाता है लेकिन फिर स्वयं को आश्‍वासन देते हैं, शायद भगवान मजाक कर रहे हैं। सो वह सम्भलते ही बड़े शांत भाव से कहते हैं- भगवन मजाक क्यों कर रहे हो?

इधर मामला हवा में उड़ता देख विष्णु अबकी पूरी तरह गंभीर हो जाते हैं, और फिर उसी गंभीरता से कहते हैं- मैं मजाक नहीं कर रहा। वास्तव में तुमसे बड़े हजारों-लाखों भक्तों से यह संसार भरा पड़ा है।

अबकी नारद बुरी तरह चौंक जाते हैं। उनके अहंकार को चोट भी तगड़ी लगती है। सो अबकी वह विष्णु से निवेदन करते हुए सीधे कहते हैं- प्रभु माफ करना, पर उनमें से एकाध का मैं दर्शन करना चाहूंगा।

विष्णु ने कहा- जैसी तुम्हारी इच्छा। ...बस वे नारद के साथ एक खेत के सामने खड़े हो जाते हैं। वहां एक किसान अपने खेत में काम कर रहा था। सूरज अभी सर पर चढ़ना शुरू ही हुआ था। ये दोनों उपयुक्त जगह ग्रहण कर किसान पर नजर रखने लगे। उधर करीब दोपहर चढ़ते तक वह किसान खेती करता रहा। उधर नारद के लिए खुशी की बात यह थी कि इतना समय बीत जाने के बावजूद किसान ने एक बार भी भगवान का नाम नहीं लिया था। इससे निश्चित ही मन-ही-मन नारद को विष्णु द्वारा उनके साथ मजाक किए जाने का अंदेशा तो दृढ़ हुआ, परंतु उन्होंने खामोश रहते हुए कुछ देर यह तमाशा और देखना ही उचित समझा।

वहां दोपहर चढ़ते ही किसान की पत्नी खाना लेकर आई। हाथ वगैरह धोकर उसने पत्नी के साथ ही भोजन ग्रहण किया। फिर कुछ देर सुस्ताया। पत्नी वापस चली गई और वह फिर काम पर लग गया। संध्या तक काम किया और घर पहुंचा। नहा-धोकर खाना खाया, बच्चों की कुछ जिज्ञासाएं शांत की और सो गया।

...सुबह फिर खेत में पहुंच गया। फिर तो यह नित्यकर्म तीन रोज तक चलता रहा। और कहने की जरूरत नहीं कि इन तीन दिनों में एकबार भी उसने भगवान का नाम नहीं लिया था। अब नारद के सब्र का बांध टूट पड़ा। उन्होंने विष्णु से कहा- आप भी क्या मजाक करने और समय बर्बाद करने मुझे यहां ले आए? इसने तो तीन रोज में एकबार भी आपको याद नहीं किया।

विष्णु बोले- तुम तीन रोज की बात करते हो, इसने तो पैदा होने से आज तक मेरा नाम नहीं लिया है। मैं तो बराबर इसपर निगाह बनाए हुए हूँ। उसको कष्ट आते हैं तो भी वह मुझको याद नहीं करता। बस कष्ट आने पर अपनी गलती खोजने में लग जाता है। मैं भी हैरान हूँ। अपनी राह से भटकता ही नहीं। अपना विश्‍व बनाने में लगा ही रहता है। ...तो कुछ समझे नारद। यही मेरा असली भक्त है। उसे ज्ञान है कि उसके विश्‍व का निर्माण उसे ही करना है। और अपने इस कर्म में वह दिन-रात लगा ही रहता है। न तो मुझे व्यर्थ परेशान करता है और ना ही मुझसे व्यर्थ की उम्मीद ही रखता है। तुम्हारी तरह बिना कोई जवाबदारी उठाए दिनभर ‘नारायण-नारायण’ नहीं करता फिरता है।

सार:- प्रकृति की रचना ही कुछ ऐसी है कि यहां कर्म और कर्तव्य ही पूजा है। और जो अपने कर्मों और कर्तव्यों में डूबा है, उनका आनंद ले रहा है, उसका जीवन वैसे ही सौ-फीसदी धार्मिक है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में अलग से किसी पूजा की ना तो आवश्यकता है, न जगह ही। ...क्योंकि फिर उसका हर कार्य ही पूजा हो जाता है। अगर सायकोलॉजी की अंतिम गहराई समझें तो धार्मिक मनुष्य होता है, धार्मिक जीवन होता है, धर्म की शिक्षा होती है; परंतु धर्म अलग से कुछ नहीं होता। बस यह वाक्य बार-बार पढ़ो, तथा प्रकृति के अंतिम सत्य को समझ लो।

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